अनंत पर सीसीए: सवर्ण बौखला क्यों गए?

अपनी रणनीतिक चूक पर प्रायश्चित की जरूरत

नीतीश कुमार की रक्षापंक्ति की पहली कतार में खड़े अनंत सिंह पर सीसीए लगा है. मनु महाराज की फाइल चली और जिलाधिकारी की मंजूरी मिलने में देर नहीं लगी. सरकार पूरी तरह लालू की है और नीतीश शराब की बोतल लेकर अपनी बेबसी बयां कर रहे हैं. 

कभी भाजपा के सहयोग से चलनेवाली एनडीए सरकार में सर्वेसर्वा की अख्खड भूमिका में रहनेवाले नीतीश के बुरे दिन आये हैं. मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान नीतीश कुमार के नीति-निर्देशक लालू हैं. धीरे-धीरे लालू प्रसाद नीतीश कुमार के सारी शक्तियों को हाशिये पर ढकाल रहे हैं और नीतीश प्रधानमंत्री का इतना बड़ा सपना पाल चुके हैं कि उन्हें हर कुर्बानी कम दिखती है. 

कभी नीतीश कुमार की ताकत रहे अनंत आज जंजीरों में जकड गए हैं. बीच में अनत की जदयू वापसी की बात चली थी और नीतीश सहमत भी थे, लेकिन लालू प्रसाद की मंजूरी नहीं मिली और नीतीश ने अंतिम फैसला लालू पर छोड़ दिया था. श्याम रजक और पी के शाही को मंत्रालय में शामिल होने से रोक कर लालू ने सत्ता में अपनी हनक का आगाज किया था. फिर तेजस्वी, तेजप्रताप और अबदुल बारी सिद्दीकी को मनचाहा विभाग दिलवाकर भी लालू ने सत्ता पर अपनी पकड़ का एहसास दिया था. 

हर विभाग के प्रधान सचिवों की लालू के आवास पर लगनेवाली जमावड़ा और उन्हें मिलनेवाले निर्देशों ने भी सरकारी कामकाज में लालू प्रसाद की सर्वोच्चता को स्थापित कर दिया था. रघुवंश सिंह के बयानों सा नीतीश की नीतियों पर प्रहार किया जाता रहा और नीतीश की छवि मलिन करने की कोशिशें लगातार जारी रहीं. 

सहाबुद्दीन को लालू की ताकत के रूप में भी जाना जाता है और मुस्लिम मतों पर मजबूत पकड़ के लिए भी शहाबुद्दीन का प्रयोग किया जाता रहा है. आज मुस्लिम की एक बड़ी जमात शहाबुद्दीन की आपराधिक छवि को अपने कौम का कवच मान चुकी है. कभी लालू के द्वारा डमी कैंडिडेट के रूप में मैदान में उतारे गए शहाबुद्दीन मैदान में संघर्ष में आ गए थे और चुनाव जीत गए थे. फिर लालू प्रसाद के खेमे में चले गए. 

कभी शहाबुद्दीन के बढ़ते औकात से चिंतित लालू ने डी पी ओझा को महारा बनाकर शहाबुद्दीन को उनकी औकात बताई थी और फिर शहाबुद्दीन को अपने पाले में करने में देर नहीं की. दरअसल ओझा की कार्रवाई से बौखलाए मुसलमानों से लालू प्रसाद को अपनी पराजय नजदीक दिखने लगी थाई और शहाबुद्दीन की मनौती में उन्हें पसीना आ गया था. कालांतर में सी के अनिल का डंडा चला और बाहुबली शहाबुद्दीन की हैकड़ी निकाल दी गयी थी.

मैं सिवान के दौरे पर कई बार जा चुका हूँ और शहाबुद्दीन के अत्याचार को मैंने नजदीक से देखा है. शहाबुद्दीन के कई गुर्गों को मैंने उस दौर में देखा था और उनलोगों ने साफ़ शब्दों में कहा था की गिनती में एक शब्द भी बोलनेवाले प्रतिद्वंद्वी को धो दिया जाता है. सिवान में किसी भी अन्य  दल के प्रत्याशी को क्षेत्र में प्रचार-गाड़ी घुमाने की छूट नहीं थी. कहीं भी बैनर लगाने की अनुमति नहीं थी. कोई भी प्रत्याशी अपने पोस्टर और पम्फलेट न तो बात सकता था और न ही कहीं चिपका सकता था. यह शहाबुद्दीन का फरमान था और लालू प्रसाद का सामाजिक न्याय की रक्षा में तल्ल्लीन प्रशासन मौन रहता था. सिवान में लालू की नहीं बल्कि शहाबुद्दीन की सल्तनत थी. यह शहाबुद्दीन राज की दास्ताँ है जिसे नीतीश के सुशासन राज में जमानत मिली है.

बकौल सुशील मोदी शहाबुद्दीन की जमानत की अर्जी पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में अधिवक्ता जनरल मौजूद नहीं थे. सरकार का कोई भी जिम्मेदार बड़ा अधिवक्ता कोर्ट की कार्यवाही के दौरान मौजूद नहीं रहा. एक तरह से शहाबुद्दीन को वॉक ओवर दिया गया था. 

दूसरी ओर अनंत सिंह पर सीसीए लगा है. अनंत नीतीश की ताकत थे. अम्न्झी को धमकाना हो, रैली में भीड़ जुटाने तो या भरी-भरकम चंदा का मामला हो तो नीतीश कुमार को अनंत सिंह की याद आती थी. नीतीश कुमार को लालू प्रसाद के दबाव में ही अनंत को गिरफ्तार कराना पड़ा था. लालू नीतीश पर दबाव बनने के लिए मीडिया में चले गए थे और यह लालू का चिर-परिचित अंदाज़ है.

दरअसल बाढ़ में एक छात्र की हत्या हुई थी. उस यादव जाती के लीदाके पर भी रंगदारी का भूत सवार था. सूत्रों की माने तो उसकी चालीस-पचास लड़कों की जमात थी और राह चलती लड़कियों के साथ छेड़खानी की कई शिकायतें आ चुकीं थीं. अपनी दबंगई की शान में शहर की लड़कियों को छेदना उस युवक की दिनचर्या में शामिल था और इन्हीं कारणों से उस युवक की हत्या हुई थी. दबंगई और छेड़खानी के शौक़ीन युवक की हत्या को चुनाव में जातीय रंग देने की कोशिश हुई और इस मसला को चुनावी मुद्दा बनाया गया. 

दरअसल हासिये पर चले गए कुछ राजनेता हताश थे और उनके इर्द-गिर्द जनता की उपेक्षा के कई सवाल थे. जनता की अदालत में उन्हें कोई जबाब नहीं सूझ रहा था. उनके सामने मतों की गोलबंदी के लिए कोई मुद्दा नहीं था. अपहरण, बलात्कार, जातीय हिंसा, बेरोजगारी, अराजकता, रंगदारी और फिरौती की तमाम खबरों ने लालो प्रसाद को एक बेसहारा राजनेता बना डाला था. उन्हें अपने बच्चों को स्थापित करने की भी चिंता थी. लालू राघोपुर का परिणाम भी देख चुके थे. बढ़ के मसला को राजनैतिक रंग देने में लालू ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

अनंत को दरकिनार कर लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को कमजोर करने में भी कामयाबी पाई और बिखर चले यादव मतदाताओं को गोलबंद कर नीतीश कुमार को अपने जनाधार के आगे नतमस्तक रहने का संकेत भी दे दिया. बाढ़ की घटना से एक ओर लालू को अपनी खोई शक्ति वापस मिली और दूसरी ओर नीतीश कुमार को समझौतावादी बनना पड़ा. 

आज सवर्ण बौखला गए हैं. कभी शहाबुद्दीन पर भी ऐसा ही डंडा चला था. तब मुस्लिमों की एकता चट्टान की तरह दिखी थी और मुस्लिम मतदाताओं का पूरा जत्था लालू राज के खिलाफ कमर कस चुका था. लालू प्रसाद को मुस्लिम मतों के खिसकते जनाधार से अपनी करारी हर का एहसास हुआ था और शहाबुद्दीन की मनौती में उन्हें पसीअना आ गया था. फिर लालू ने शहाबुद्दीन की ओर लाल नेत्रों से देखने की जुर्रत नहीं की. 

ऐसे भी मुस्लिम अपनी हितों से समझौता नहीं करते. उनके मतों का बिखराव नहीं होता और अपनी हितों की कीमत पर मतदान नहीं करते. दलों को टटोलते हैं और गंभीरता के साथ अपनी सुरक्षा और हित का पूरा ख्याल रखते हैं. बिन मांगे समर्थन देने का इनका इतिहास नहीं रहा है. दूसरी ओर सवर्ण और विशेष रूप से भूमिहार मतदाताओं में कोई राजनीतिक एकता नहीं है. इनकी कोई पार्टी भी नहीं है और न ही अपने मतों की कीमत वसूअलाए की ऐडा इन्हें आती है. हर बार अपना समर्थन बिना मांगे उड़ेलने का इनका पुराना इतिहास रहा है. चाय-पान की दूकानों पर क्रांतिकारी परिवर्तन के नारों के बीच भूमिहारों के मतों का एक भारी प्रतिशत भी अब बिकने लगा है और इनका मत टुकड़ों में बंट जाता है. आज अनंत पर सीसीए पर उफननेवाला भूमिहार समाज कल  शहाबुद्दीन के दल को भी समर्थन दे देगा. राजनीतिक समीकरण में पारंगत होने का दंभ पालनेवाली भूमिहार जाति अपने बडबोलेपन की शिकार है. बिक्रम सीट पर महागठबंधन के पक्ष में मतदान करनेवाले भूमिहार ब्रम्हेश्वर सिंह की हत्या के बाद आग उगल रहा था. राष्ट्रवादी किसान संघ चलानेवाला इंदुभूषण तरारी में अखिलेश सिंह के समर्थन में देखा गया था. ब्रम्हेश्वर सिंह  की हत्या में पालीगंज के भूमिहारों की गर्जना बहरहाल जिला परिषद् के चुनाव में जदयू के पक्ष में लामबंद थी. 

अनंत पर भूमिहारों की बेकार की गर्जना का कोई अंत नहीं है, क्योंकि इनके क्षणिक विरोधों का कोई भी दूरगामी परिणाम नहीं दिखता. प्रत्याशी हर बार चुनाव जीतता है, लेकिन भूमिहारों की मानसिकता हर बार हारती है. दरअसल इनकी एकता किसी को हारने की नीयत से बनती है. अपने हित में किसी को जीत दिलाने की इनकी योजना धरातल पर नहीं दिखती. एक दल को हराने के लिए हमेशा उससे कम खतरनाक दल के पक्ष में इनके मतों के शिफ्ट से हर दल ने इनका महत्व ही घटा दिया है.

यदि चुनाव के दौरान पूरी चुप्पी और एकता बरत कर भूमिहार अपने हितों को ध्यान में रखते हुए मतदान करें तो कोई भी सरकार इनकी सहभागिता और चिरौरी के बिना नहीं बन सकती. हर दल में इनका महत्व होगा, योजनाएं इन्हें ध्यान में रखकर बनायीं जायेगीं, लेकिन फिलहाल इसके आसार नहीं दिखते  

 

2 thoughts on “अनंत पर सीसीए: सवर्ण बौखला क्यों गए?

  1. वीरू says:

    सर, मौजूदा हालात में अभी बीजेपी और जदयू के बिच अलायन्स की गुंजाइस है क्या? जैसा की मिडिया में अंदरखाने इस तरह के हलचल की खबरे आरही है।

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