अपने शोषण और उपेक्षा पर सिसकता कल्याणपुर.

जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का शिकार  

कल्याणपुर की लम्बी दास्ताँ है.


बी.बी. रंजन के नेतृत्व में बिजली विभाग की टीम गाँव में सर्वे करने गयी थी और तब महज दो वर्षों पूर्व गाँव को बिजली की रोशनी मिली.

नाम मात्र के विद्युतीकरण के बाद गाँव अँधेरा ही रह गया था, अलबता बिजली सुविधा से युक्त सूची में कल्याणपुर का नाम दर्ज हो गया था. गाँव की ओर से कई आंशिक असफल प्रयास किये गए. कभी खपुरी के रास्ते बिजली पोलो को गांववालों की मिहनत से स्थापित कराया गया, लेकिन ग्रामीणों की मिहनत पर पानी फिर गया, गाँव ने बिजली की किरण नहीं देखी. 
बी.बी. रंजन के नेतृत्व में बिजली विभाग की टीम गाँव में सर्वे करने गयी थी और तब महज दो वर्षों पूर्व गाँव को बिजली की रोशनी मिली. अभी भी आपसी विवाद के कारण गाँव के एक हिस्से को अपना भरपूर अधिकार नहीं मिला है, लेकिन बिजली मिल गई है. 

ईजरता-कल्याणपुर सड़क के त्रिकोण पर एक चापाकल तो लग गया, लेकिन पानी के निकास की समुचित व्यवस्था नहीं की गई. आहार में गिराने के लिए महज दस मीटर लम्बी भूमिगत नाली की जरूरत थी. डेंगू, मलेरिया और चिकुनगेनिया के मच्छरों के पनपने की जगह की समुचित व्यवस्था, गंभीर बीमारियों से लोगों के जकड़ने की संभावनाओं को बल.

अपने शोषण और उपेक्षा पर सिसकता कल्याणपुर. हमारी पूरी पारदर्शी कोशिश होगी कि पटना और दिल्ली के एसी कमरों में बैठनेवालों राजनेताओं और हुक्मरानों की निष्क्रियता का सच उजागर हो, हम जागरूक हों. अपने अधिकार और कर्तव्य को समझे और लोकतन्त को गिरवी रखने की प्रक्रिया समाप्त हो.

पालीगंज प्रखंड में स्थित गाँव कल्याणपुर जनप्रतिनिधियों का मारा है, इसकी उपेक्षा की लम्बी दास्ताँ है. आहर का बाँध कई वर्षों से टूटा पड़ा है और सिचाईं के उपयुक्त पानी बह जाता है. गाँव के कई आहार मृतप्राय हो चुके हैं. आहरों की उड़ाही का समुचित प्रबंधन नहीं होता और तलछट कम होती जा रही है, चौड़ाई घटती जा रही है. गाँव के गलियां संकरी होती जा रही है. रकासिया- कल्याणपुर पथ जर्जर है और विद्यालय के पास स्थित पुल दुर्घटना का कारण बन सकता है. गाँव की गलियों का समुचित प्रबंधन और विकास नहीं है. करहों में मिट्टी और घास-पुआल की भरमार है जो किसानों की खेती और पटवन को प्रभावित करतीं हैं. पालीगंज की ओर जानेवाले दक्षिणी मार्ग पर आज तक एक पुल का निर्माण नहीं हुआ. इस पथ के पक्कीकरण के बाद मुख्यालय से गाँव की दूरी महज 4 किलोमीटर होती है. भगजोगा से पालीगंज तक मार्ग का पक्कीकरण हो चुका है. महज तीन किलोमीटर सड़क के निर्माण के बाद कल्याणपुर ज्यादा सुरक्षित और सुगम होगा.
कहने को गाँव में एक स्वास्थ्य केंद्र भी है, लेकिन लगभग बंद रहता है. स्कूल के संचालन पर भी सवालिया निशान रहे हैं और कई वर्षों से विद्यालय विवाद का केंद्र बन चुका है. ग्रामीण इस पर सवाल नहीं करते. 
गाँव में लगभग चौबीस सौ मतदाता हैं, चार हजार लोग हैं. सभी दलों के पर्याप्त समर्थक हैं. महागठबंधन के पक्ष में मतदान का प्रतिशत अधिक रहा है. भाजपा भी अपनी दमदार उपस्थिति रखती है. गाँव उग्रवाद की समस्या झेलता रहा है और कई हत्याओं का गवाह भी बन चुका है. किसी भी जनप्रतिनिधि ने गाँव को सम्मान की नज़रों से नहीं देखा है. गाँव के विकास की कोई समुचित और निर्णायक योजना नहीं है. गलियों का एक छोटा हिस्सा ढलाई है तो शेष भाग कई किश्म के ईंट सोलिंग के गवाह हैं. जनप्रतिनिधियो की उपेक्षा से गाँव विकास-कार्य से कोसों दूर है.
ईज़रता-कल्याणपुर मार्ग पर स्थिति खेतों के मालिक ठेकेदार की कारगुजारियों के भुक्तभोगी हैं और उनकी खेतों को आहर का स्वरूप दे दिया गया है. सड़कों के निर्माण में कोताही परिलक्षित है, मरम्मत कोसों दूर की बात है.
हमारी पूरी पारदर्शी कोशिश होगी कि पटना और दिल्ली के एसी कमरों में बैठनेवालों राजनेताओं और हुक्मरानों की निष्क्रियता का सच उजागर हो, हम जागरूक हों. अपने अधिकार और कर्तव्य को समझें और लोकतंत्र को गिरवी रखने की प्रक्रिया समाप्त हो. मुश्किल से मिली है आजादी. यह आजादी विकास, कल्याण और नैतिकता के लिए समर्पण की मांग करती है. हमारी कोशिश होगी की हम अपने क्षेत्र में व्याप्त दुखों को गंभीर भरी नज़रों से देखें और शिथिल जनप्रतिनिधियों को आगाह करा दें: ‘सिंहांसन खाली करो कि जनता आती है.’  
बहरहाल गांववालों की सक्रियता और जागरुकता पर भी सवालिया निशान है. ऐसा गांववाले ही कहते हैं.

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