उषा-रामजनम की खींचतान और पालीगंज भाजपा

राजनीतिक उठापटक के बीच संपन्न हुआ पालीगंज भाजपा का मंडल चुनाव      

पालीगंज और दुल्हिनबाज़ार मंडल में रामजनम शर्मा उर उषा विद्यार्थी के बीच वर्चस्व की जंग चिद चुकी है. उषा  विद्यार्थी पालीगंज पर अपनी पकड़ बरकरार रखन चाहतीं हैं और विक्रम से नाउम्मीद रामजनम की भी पालीगंज मजबूरी है. ऐसे तो रामजनम शर्मा भरी मतों से विधानसभा चुनाव हर चुके हैं. बिक्रम की राजनैतिक लड़ाई में भी बड़ी बेआबरू होकर रामजनम ने भारी मन से पालीगंज का रूख किया था. विक्रम में एक चुनाव जीतने के बाद रामजनम की चुनाव हारने की एक लम्बी फेहरिस्त रही है और जनाधार समाप्त सा हो गया है. कोपा और पितामास का भारी बहुमत उनके पक्ष में तो दिखता है, लेकिन दो गावों के बूते राजनीति तो नहीं हो सकती. खोये जनाधार की वापसी एक दुरूह प्रक्रिया है.

चुनाव प्रचार के दौडान ही रामजनम की चुनावी रणनीति और सक्रियता दर्शा रही थी कि उन्हें अपनी जीत सदेहास्पद लगती है. दुल्हिंबाज़ार के एक कार्यकर्ता ने नाम उहीं छपने की शर्त पर बताया की रामजनम चुनाव के दौड़ान दुल्हिंबाज़ार पार्टी कार्यालय से कन्नी काटते थे और उनका आना-जाना देवरिया रोड से होता था. चुनावी मुहिम में उनके रिश्तेदारों की सक्रियता थी और शेष कार्यकर्ताओं को हासिये पर रहने का मलाल था. रामजनम जानते हैं की पालीगंज से भाजपा की जीत एक दुर्घटना जैसी है. लेकिन उनकी पराजय की फेहरिस्त देखें तो उनके पास अपनी राजनीति जिन्दा रखने का कोई विकल्प नहीं है. राजनैतिक रूप से हासिये पर विराजमान रामजनम और उषा आज तेल कम्पनियों के अघोषित कारोबारी बन गये हैं.

उषा विद्यार्थी भी विक्रम से किस्मत आजमा चुकीं हैं और दो हतार से भी कम मतों पर संतोष करना पड़ा था. पालीगंज में नीतीश समर्थकों की बदौलत उन्हें जीत को मिली थी, लेकिन विधायिकी के पांच वर्षों के अन्दर पालीगंज के सवर्णों का इतना बड़ा एक विशाल समूह उषा के वर्ताव का विरोधी बन गया की उनके समर्थकों को बोलने में परेशानी होती है. आज उषा का क्षेत्र में जो भी समर्थन बचा है वह उनके पति की सहृदयता और सक्रियता का प्रतिफल है. उषा विद्यार्थी के व्यवहार से पालीगंज के लोग मर्माहत हैं. भाजपा के अन्दर भी उनका भारी विरोध है. पालीगंज में भाजपा का एक बड़ा धड़ा रामजनम शर्मा का भी जबरदस्त विरोधी है.

पालीगंज मंडल के चुनाव में उषा और रामजनम ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी. रामजनम समर्थक चार लोगों ने अध्यक्ष पद का नामांकन किया था.  नामांकन पालीगंज से पटना के प्रदेश कार्यालय तक लिया गया था. उषा समर्थक पांच लोगों के भी नामांकन किया था. भाजपा सूत्रों की माने तो उषा विद्यार्थी की पहली पसंद उनका एक कार्यकर्ता था जबकि रामजनम शर्मा अपने एक करीबी रिश्तेदार के लिए परेशान थे. एक पुराने भाजपाई के लिए जनार्दन शर्मा की एक कमजोर लौबी भी काम आकर रही थी. सुखदा पाण्डेय के ऊपर इन तीनों दावेदारों ने दबाव बनाने की भरपूर कोशिश की थी. ऐसे एक जमाने में भाजपा में सुखदा पाण्डेय को अहमियत दिलानेवालों में जनार्दन शर्मा का नाम भी शुमार था. आज दलबदल की मार से ट्रस्ट और पालीगंज के अपने विधायिकी के कार्यकाल को भलीभांति निभाने में असफल रहे जनार्दन शर्मा पिछले कई वर्षों से राजनीति में हासिये पर हैं. 

सुखदा पाण्डेय ने अंततः अकबरपुर के एक पुराने रामजतन सिन्हा समर्थक को प्क्लिगंत मंडल अध्यक्ष की बागडोर सौपी. रामजनम समर्थकों का अखाना है की ऐसे तो वर्त्तमान अध्यक्ष रामजतन का समर्थक रहा है, लेकिन उषा विद्यार्थी के कार्यकाल में वह ठेकेदारी से जुदा था और उषा का भी करीबी बन गया था. 

दुल्हिंबाज़ार मंडल अध्यक्ष के चुनाव में भी उषा समर्थक को सफलता मिली. ऐसे वर्त्तमान अध्यक्ष रामजनम शर्मा के चुनाव में सक्रिय मन गया था, लेकिन रामजनम की पसंद एक अन्य उम्मीदवार था, लेकिन उसका मनोनयन नहीं हो सका.  

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