ग्रामीण बंद स्वास्थ्य केन्द्रों के एएनएम से लें मोबाइल पर लोकेशन, पालीगंज के उपाधीक्षक और सिविल सर्जन से करें सवाल: मंजूषा

 

MANJUSHA RANJAN

                    मंजूषा                                सेक्रेटरी, नई सुबह सोशल  एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट                          कल्याणपुर, पालीगंज, पटना. 

                                                                          आर्थिक, क्षणिक तुच्छ आर्थिक लाभ और लोकतंत्र के प्रति अज्ञानता की परिणति है आपकी दुर्दशा.

इस खेल में पीएचसी के प्रभारी एवं उपाधीक्षक की पूरी संलिप्तता है और आपके प्रतिनिधियों में से कुछ इनके दलाल हैं.

आज बाढ़ से प्रभावित जनता को लालू के अठ्ठाहास  पर पछतावा हो रहा है.  

ग्रामीणों की जागरूकता से नियमित हो पायेंगे उपकेन्द्र. जनप्रतिनिधियों की शिथिलता के लिए मतदाताओं की गलत शैली जिम्मेदार. क्या एएनएमों को उपकेन्द्र बंद रखकर पूरा वेतन लेने की आजादी है या देश की जनता को स्वास्थ्य उपकेंद्रों को चलवाले की आजादी? आपकी चुप्पी और शिथिल लोगों के नेतृत्व से बंद हैं उपकेन्द्र. ग्रामीणों को चुनावी जातीय गोलबंदी और शिथिल प्रतिनिधियों  भरोसे सुधार की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की समझ होनी चाहिए. उनके अन्दर आत्मनिर्भर बनने का जूनून होना चाहिए. उनके अंदर भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा उठाने का जज्बा होना चाहिए. उन्हें बंद स्वास्थ्य उपकेंद्रों को अपनी नियति मानने को मजबूर नहीं होना चाहिए, बल्कि इन बंद पड़े स्वास्थ्य-केन्द्रों को खुलवाने के प्रति गंभीर दिखना चाहिए. अधिकार और कर्तव्य के प्रति सजगता जरूरी है.

आज बाढ़ से प्रभावित जनता को लालू के अठ्ठाहास  पर पछतावा हो रहा है. कल जातीय गोलबंदी कर चुनावी समीकरण बनाया जा रहा था और जनता अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को दरकिनार कर रही थी. नीतीश कुमार के बयान शालीनता भरे हैं और गंभीरता के दावों से परिपूर्ण भी, लेकिन स्पॉट वेरिफिकेशन के बाद राहत कार्य कहीं नदारद है तो कहीं काफी कमजोर. लालू प्रसाद के सामने ही निःशुल्क विस्थापन की जारी प्रक्रिया पर एक बुजूर्ग ने सवाल खड़ा किया और नाविकों के द्वारा पांच सौ रूपये की वसूली कर विस्थापन कराने की सिस्टम का विवरण दे डाला. निरूत्तर लालू अपनी पुरानी जिद्दी शैली पर उतर आये और उन्होंने विस्थापन के बाद पैसे का बिल जमा कर भुगतान लेने का शगूफा छोड़ा दिया. सबको पता है की बिल के भुगतान जैसी कोई बात नहीं होनेवाली. असंतुष्ठ बुजूर्ग लालू प्रसाद के बुलावे की अनदेखी कर आगे चला. यह एक सजग और संवेदनशील राजनेता के लिए बड़ी असफ़लता है, लेकिन लालू इसके प्रति गंभीर होने के बजाए जानलेवा बाढ़ की विभीषिका को सौभाग्य बतलाने लगे, पूजा की नसीहत देने लगे. एक ६८ वर्षीय राष्ट्रीय नेता के ऐसे गैरजिम्मेदाराना और असंवेदनशील बयान की देश भर में निंदा हुई, लेकिन उन्होंने अफसोस नहीं जताया. 

मतदान के समय अपनी गंभीरता को दफ़न करने का परिणाम है बंद उपकेन्द्र. गर्भवती महिलाओं की नियमित मासिक जांच और पीएचसी या रेफ़रल अस्पताल तक इसकी माहवार रिपोर्ट पहुंचाने की जिम्मेदारी इन उपकेंद्रों पर पदस्थापित एएनएमों की है. हल्की-फुल्की दवाईयां भी इन केन्द्रों पर आतीं हैं. सरकारी पंजियों में इन एएनएमों की नियमित ड्यूटी दर्शायी जाती है. इस खेल में पीएचसी के प्रभारी एवं उपाधीक्षक की पूरी संलिप्तता है और आपके प्रतिनिधियों में से कुछ इनके दलाल हैं. इन दलालों की बैठकी इनके साथ होती है, लेकिन इस अव्यवस्था पर इन गैरजिम्मेदार प्रतिनिधियों की हलक बंद रहती है.

शिथिल प्रतिनिधियों के क्षेत्रों की जनता को जागरूक होकर इन केन्द्रों को खुलवाने की पहल करनी चाहिए और इनके नियमित संचालन के प्रति गंभीर होना छाहिये. एक उपकेन्द्र के संचालन में प्रतिमाह चालीस-पचास हजार रूपये से अधिक का खर्च आता है. एक प्राथमिक विद्यालय के संचालन में मासिक दो लाख रूपये से अधिक का खर्च आता है. लेकिन न तो आपके बच्चे निःशुल्क शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं और न ही आपका निःशुल्क प्राथमिक उपचार हो पाता है. जनतंत्र में भी जनता की दुर्दशा के लिए दोषी कौन? ……………जनप्रतिनिधि या मतदाता?

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