चुनाव तो राजवल्लभ, सरफराज और शहाबुद्दीन भी जीतते है.

Image result for rajvallabh and sarfaraaj bihar mlaमतदाताओं की हालत गरीबी की मार से त्रस्त एक अबला जैसी है, जिसकी मदद की गुहार पर हमारा पुरूष समाज उसकी यौवन को निहारता है और उसकी लज्जा को भंग करने के अवसर की प्रतीक्षा करता है. आज जनता शिकार है, राजनीतिज्ञ शिकारी हैं, जहाँ प्रतिनिधित्व, जनसेवा और लोकप्रियता बेकार की बातें हैं: बी. बी. रंजन.

Related imageचुनाव तो राजवल्लभ, सरफराज और शहाबुद्दीन भी जीतते है. जनप्रतिनिधि तो अर्जुन मुंडा, ए. राजा और कनिमोझी भी हैं. वाजपेयी सिंधिया से चुनाव हार जाते हैं. बहुगुणा की अमिताभ बोलती बंद करा देते हैं. कभी रामाश्रय प्रसाद सिंह, सुरेन्द्र यादव से पराजित हो जाते हैं. भारत की ‘वन ऑफ़ द मोस्ट टैलेंटेड ब्रेन’ तारकेश्वरी सिन्हा, धर्मवीर भारती से हार जातीं हैं और धर्मवीर भारती, प्रकाश चन्द्र से हार जाते हैं. रामजीवन सिंह सरीखे नेता सूरजभान से हार जाते हैं. रामनरेश राम मुखिया की जंग हार जाते हैं और विधानसभा में उनकी गरिमा Image result for shahabuddinसाबित होती है. मधु लिमये की निम्न पदों पर पराजय की दास्ताँ और फिर उच्च पदों पर स्थापित होनेवाली काबिलियत से संभवतः आप वाकिफ हैं. चुनावी जीत में घोटालेबाजों की लम्बी फेहरिस्त आप देख रहे है. घोटालेबाजों की पूरी अयोग्य वंशावली की राजनैतिक धमक व धनबलियों की सत्ता में भागीदारी से भी आप वाकिफ हैं, हत्यारों की राजनीतिक जीत की धमक से भी विस्फारित हैं, अपने गलत निर्णयों की पीड़ा से भी मर्माहत हैं. अन्यथा चुनावी जंग में महज दो-चार सौ रूपये के आप मुंहताज न होते, आपके समक्ष चंद रूपये के प्रलोभन को परोसने की कोई हिम्मत नहीं करता, लोकतंत्र पर सवालिया निशान की नौबत नहीं आती और राजनीति भ्रष्टाचारियों की रखैल नहीं कहलाती.

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रामजीवन सिंह: ईमानदारी की प्रतिमूर्ति

आज आपके समक्ष महज साडियों के प्रलोभन पर लोकतांत्रिक जुआरी बनने की विवशता है. बेकारी, अराजकता, गरीबी और अविकसित स्वरूप को एक साजिश के तहत स्थापित किया गया और आपकी सोच पर विराम लगा गया, आपकी संवेदना की हत्या हो गयी, आपकी जागरूकता का सर्वनाश हो गया, फिरंगियों से लोहा लेने की आपकी क्षमता बर्बाद हो गयी. आप की हालत गरीबी की मार से त्रस्त एक अबला जैसी है जिसकी मदद की गुहार पर हमारा पुरूष समाज उसकी यौवन को निहारता है और उसकी लज्जा को भंग करने के अवसर की प्रतीक्षा करता है. आज जनता शिकार है, राजनीतिज्ञ शिकारी है, जहाँ प्रतिनिधित्व, जनसेवा और लोकप्रियता बेकार की बातें हैं. हो सकता है, क्षणभर के लिए आप मेरी बातों से सहमत न हों, हो सकता है बिकाऊ तबके का प्रतिरोध सामने आये, लेकिन …….’तू जो माने या न माने, लोग मानेंगे जरूर’ ………

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