लोकतंत्र के मालिक की लाशों पर राजनीति. जरा सोचये! *बी.बी. रंजन.

फेसबुक आतंरिक फेस और सकारात्मक सोच की अभिव्यक्ति का मंच. धौंस और रूतबा के भौंडी प्रदर्शन पर रोक के लिए स्वविवेक को जगाएं यूजर्स.

प्रायोजित तस्वीरों से सुर्ख़ियों में बनने की कवायद नहीं, धरातल पर निदान चाहिये. इन मुद्दों को क्षणिक प्रायोजित उछाल के सत्तर साल बीत गए, लेकिन तस्वीर बिगड़ती गयी. घुरनाबीघा हमारे बीच की एक इकाई हो सकता है. सड़क की समस्या एक सांकेतिक समस्या हो सकती है. यहाँ तो पूरा मशीनरी फेल है और प्रायोजित तस्वीरों के प्रायोजक सत्ता के सिपहसालार हैं. तो फिर जिम्मेदार किसे ठहराया जा रहा है? सुर्ख़ियों में बने रहने की कवायद एक बार फिर फोटो ऑप की बढ़ती प्रवृति को प्रमाणित कर जाता है.

घुरनाबीघा पिछड़ों का गाँव है. पालीगंज की राजनीति पिछड़े प्रतिनिधित्व के इर्द-गिर्द घुमती रही है. स्व.रामलखन सिंह यादव जैसे कद्दावर नेता ने इस क्षेत्र का लम्बा प्रतिनिधित्व किया और आज कमान पोते को मिल गयी है. स्व.चंद्रदेव प्रसाद वर्मा को भी एक लम्बा कार्यकाल मिला और नन्द कुमार नंदा सहित दीनानाथ सिंह यादव ने भी प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त किया. पालीगंज सत्ताधारी विधायकों की एक लम्बी फेहरिस्त के बीच उपेक्षा और व्याप्त पिछड़ापन की एक नंगी तस्वीर पेश करता है. आजादी के बाद पालीगंज में लगभग 15 वर्षों तक सवर्णों को विधायकी मिली.

सवाल उठानेवाले नाटकबाजों को कल्याणपुर-ईजरता मार्ग के लगभग 600 मीटर की सड़क के पक्कीकरण में अलकतरा एवं गिट्टी की बिछाई में निर्धारित मापदंड के उल्लंघन पर सफाई देनी चाहिए, राजनीतिक मिशन रखनेवाले ठेकेदारों को सड़क के बगल के किसानों के खेतों को आहर में तब्दील कर देने की कारगुजारियों पर जबाब देना चाहिए. पांच सौ छिद्रों वाले गंजी और बनियान पहने आत्महत्या करने को विवश किसानों के खेतों को पोखरा में तब्दील कर उनकी गरीबी भरी जिन्दगी में एक नया पृष्ट जोड़ दिया गया. एक धूमिल धोती और मटमैले कुर्तों में मलिन चेहरा लेकर टकटकी भरे नेत्रों से चमत्कार की झूठी उम्मीद में भगवान की ओर टकटकी लगाए किसानों की जमीनें नीलाम होतीं गयीं और सामाजिक न्याय की सरकार जमींदार का तगमा देकर उन्हें मूलभूत अधिकारों से वंचित करती गई. फोटो ऑप, मीडिया माइलेज और पॉलिटिकल स्कोर के किरदारों ने हमेशा इन शोषक राजनीतिज्ञों की अगुआनी की. फोटो ऑप की राजनीति करनेवाले चापलूस और छुटभैये राजनीतिज्ञ ऐसी सरकार के सिपहसालार बने रहे. ऐसे लोगों ने वक्त के हिसाब से दल भी बदल लिया, नारे भी बदल गए. अवसरवादी राजनीति के दूकानदारों ने जनता की समस्याओं के हिसाब से नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व मिलने के आसार के अनुसार दल बदलते गए और अभी दलबदल की कई सम्भावनाये बरकरार हैं. चाल, चरित्र और चेहरा रसातल में जाते रहे और ठेकेदारी व दलाली का खुला खेल चलता रहा. राजनीति कितनी बदल गई, जनसेवा के नाम पर जनप्रतिनिधि दलाल बन गए, विधायको और सांसदों की अगुआई करनेवाले पंचायत प्रतिनिधि ठेकेदार बन गए. धान क्रय केन्द्रों पर बिचौलिये हावी हो गये, अंचल में दलालों की सत्ता स्थापित हो गयी, पुलिस मुखविरों की जेब में चली गयी. हर हाल में किसान परेशान होता गया, मजदूर हलकान होते गए, गरीबों की बेवशी बढ़ती गयी और बाहुबलियों ने चुनाव में दस्तक दे दी, धनबलियों ने राजनीति पर अधिकार कर लिया. लोकतंत्र का मालिक रंक बन गया और जनसेवक राजा बन गए.

पिछड़ों की उपेक्षा के लिए पिछड़े राजनेता जिम्मेदार हैं, सामाजिक न्याय की ढिढोरी सरकार जिम्मेदार है, अवसरवादी राजनीति करनेवाले दलबदलू जबाबदेह हैं. विकास में राजनीति की बातें जनता में भटकाव और विद्वेष पैदा करने की नीति है, निकम्मी सरकार और निकम्मे राजनीतिज्ञों की बेवशी है, सस्ती लोकप्रियता की आकांक्षा है. न हम पिछड़ा हैं, न दलित हैं, न हिन्दू हैं, न मुसलमान है. हम भारत के जिम्मेदार नागरिक हैं और विकसित भारत मेरा मिशन है, पैसों का पारदर्शी और निष्पक्ष सदुपयोग हमारा अधिकार है.

पालीगंज के भेड़हरिया इंग्लिश गाँव में वनसुअर के आक्रमण से एक व्यक्ति की ह्रदयविदारक मौत हो जाती है. गाँव ग़मगीन हो जाता है. कई एंगल से तस्वीरें शूट कराने की आदि एक अवसरवादी छुटभैये नेता का आगमन होता है और उसी दिन मातमपूर्सी की तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट कर दी जाती है. जून के महीने में सड़क हादसा में उसी गाँव के एक अन्य व्यक्ति की मौत हो जाती है. मातमपुर्सी के दौरान फोटो ऑप का एक और अवसर मिल जाता है और इसकी तस्वीर भी फेसबुक पर पोस्ट कर दी जाती है. ग़मगीन वातावरण में भी फोटो ऑप पर कितनी सतर्कता बरती जाती है, पॉलिटिकल स्कोर को बढाने की रणनीति पर कैसे अमल किया जाता है. लाश पर ऐसी घिनौनी राजनीति का प्रमाण आपको 20 अगस्त और 22 जून के फेसबुक पर मिलेगा. दावों की प्रामाणिकता पर सवालिया निशान की गुंजाइश नहीं है. यह कितनी बड़ी हृदयहीनता है, कैसी संवेदनहीनता है. यह दरिन्दगी की पराकाष्ठा, निर्मोही चरित्र की निर्ममता और राजनीति में नैतिकता के पतन का घिनौना स्वरूप है. यही आज के गैरजिम्मेदार और असंवेदनशील लोगों की राजनीति है. जरा सोचये! लोकतंत्र के मालिक की लाशों पर राजनीति.

सार्वजनिक जीवन जीनेवाले लोगों के चाल, चरित्र और चेहरा के सम्यक विश्लेषण की जरूरत है. सकारात्मक और पारदर्शी सोच चारित्रिक कारखाने में पैदा होते हैं. संवेदना, मानवता, ईमानदारी और साख चारित्रिक विशेषता है, जबाबदेही और स्वाभिमानी नैतिकता प्राकृतिक गुण है. संस्कार बाजार में नहीं बिकता.

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