नौबतपुर में क्यों पैदा होते हैं रंगदार: बी.बी. रंजन

पिछले 28-30 वर्षों से नौबतपुर हिंसक गतिविधियों का केंद्र रहा है.Image result for naubatpur

नौबतपुर में अनगिनत लाशें बिछती गयीं और लाश बिछानेवाले भी ढेर होते चले गए. कभी वामपंथियों का गढ़ माना जाता था नौबतपुर. अब पिछले 28-30 वर्षों से अपराधियों का गढ़ माना जाता है. आपराधियों के गाँव बदलते गए लेकिन रंगदारी टैक्स का क्षेत्र  नहीं बदला. आपसी प्रतिद्वंदिता भी देखी गयीं और इस मुहिम का गाँव-गाँव तक असर रहा. कई बार जातिवादी हिंसक वारदातें प्रारंभ हो गयीं और कई निर्दोष लोग मारे गए. कई अपराधियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई प्रारंभ हुई और इनके बीच एक-दूसरे को खदेड़ने की खबरें भी आतीं रहीं, लेकिन वर्चस्व की लड़ाई में इन गिरोहों के बीच कभी जमकर गोलीबारी की घटना नहीं हुई. वर्चस्व की लड़ाई में इन गिरोहों के लोगों की लगभग हत्याएं भी नहीं हुईं. मारे गए लोग अक्सर इन गिरोह के सरगनाओं के जातिवाले रहे. कभी व्यापारियों को निशाना बनाया गया, कभी निर्दोष और निरीह लोगों की हत्या होती रही. 

नौबतपुर कभी फुलवारीशरीफ विधानसभा क्षेत्र में आता था और फिर यह क्षेत्र सुरक्षित था. नौबतपुर नेतृत्वविहीन क्षेत्र रहा. दरअसल नौबतपुर क्षेत्र पटना के बाकी क्षेत्रों से कटा हुआ था. आवागमन की कमजोर सुविधा से नौबतपुर के लोग परेशान थे. आसपास के क्षेत्रों से सम्पर्क कटा था और संचार की कमी थी. इन्ही इन कारणों से नौबतपुर का शुरूआती दिनों में विकास नहीं हुआ. 

एक-दो अनपढ़ या अनाड़ी किस्म के स्थानीय छुटभैये नेताओं को छोड़ दें तो सुरक्षित क्षेत्र होने के कारण नौबतपुर नेतृत्व विहीन क्षेत्र था. अनाड़ी नेताओं का न तो कोई कांसेप्ट था, न दूरदृष्टि थी. उनके पास नेतागिरी के लिए महज दबंग बनने भर का आईडिया था. कुछ नौनिहालों को मार्गदर्शन देने के बजाये इन छुटभैये नेताओं ने लफंदर बनने की ट्रेनिंग दी और अपनी शैली को आगे बढ़ाया. दरअसल इन अनाड़ी नेताओं को एक लफंदर जमात की जरूरत थी. परिपक्व लोग इस मुहिम में शामिल नहीं होते. इसलिए नौजवानों को इस कार्य में मोड़ने की नीति बनाई गई और उनके लड़कपन और अपरिपक्वता का लाभ लिया गया. दरअसल क्षेत्र के कई नौजवानों को टारगेट कर अपना राजनैतिक जीवन संवारा गया.  नवयुवकों की बर्बादी पर अपनी चमक कायम की गई और अंततः उन्हें किसी लायक नहीं छोड़ा गया. नौबतपुर में एक-दो अनाडी नेताओं को अपनी पैठ के लिए जमात की जरूरत थी और जमात के लिए बर्बाद लड़कों की जरूरत तो पड़ती ही है. कंडक्टर की शक्ल में कई रंगरूट पैदा किये गए.

नौबतपुर क्षेत्र के कई भट्ठा मालिकों ने भी एक-दूसरे को परेशान करने के लिए कई रंगरूटों को प्रश्रय दिया. कई भट्ठेदारों ने रंगरूट पैदा किये और अपनी व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ इनका इस्तेमाल किया. धीरे-धीरे ऐसे लोग सड़क पर आते गए. पुलिसिया कार्रवाई के दायरों में फंसते गए और राहत के लिए छुटभैये नेताओं पर निर्भर होते चले गए. हथियार उठाने की मजबूरी हो गयी. मामले बढ़ते गये. खर्च बढ़ता गया, घर की जमीने बिकतीं गयीं और छिपने के लिए शेल्टर की तलाश जारी हो गई. अब इन रंगरूटों को रंगदार कहा जाने लगा और इन्हें अपनी टीम में नये रंगरूटों की बहाली की जरूरत पडी. बचपना बन्दूक की ओर आकर्षित करता है क्योकिं उमंगपूर्ण उम्र में समझ को मोड़ा जा सकता है. शराब, मछली, गोली और बन्दूक के बीच बच्चों को रंगदारी और पुलिस के खिलाफ साहसपूर्ण प्रदर्शन की कथाओं को प्रचारित किया गया और अबोध बच्चे उनकी गिरफ्त में आते गए. 

सुरक्षा और शेल्टर के लिए जाति पर खतरा का नारा देकर अपनी जातियों को गोलबंद किया गया और एक समय में नौबतपुर क्षेत्र के कई घरों में दामाद से अधिक इज्जत एक रंगदारों को दी जाने लगी. लोग अपनी जाति के रंगदारों को अपनी जाति का नाज बताने लगे. नौबतपुर में दो जातियों के रंगदारों के बीच संघर्ष का लम्बा दौर चला लेकिन दोनों के बीच कभी खूनखराबा की नौबत नहीं आयी. पीछा करते वक्त कभी किसी की बाइक खराब हो गई तो कभी कोई बाल-बाल बच गया. ऐसी खबरें आये दिन मिलती रहीं और दोनों जातीय रंगदारों को रंगदारी टैक्स निर्बाध मिलते रहे. हत्या हर बार निर्दोष लोगों की हुई, रंगदारी देनेवालों की हुई या रंगदारी देने में आनाकानी करनेवालों की हुई. अलबत्ता कई बार शेल्टर देनेवाले लोग भी मारे गए, कई बार शेल्टर देनेवाले लोगों पर ही मुखबिरी के आरोप लगे.कई बार शेल्टरदाता ही भुक्तभोगी बन गए. 

इन रंगरूटों की हत्या कभी अनायास पुलिस के हाथों हुई, कभी इनके पोषकों के ऊपर मुखबिरी के आरोप लगे, कभी इनके कैशियरों  की ओर से साजिश की खबरें चलीं. कई अपराधी अपने स्वजातीय रंगरूटों के हाथों मारे गए. कई रंगदार अपने दोस्तों की गोली के शिकार हुए. कई घर तबाह हुए, कई सुहागन अभागन बन गई, कई माताओं के कोख उजर गये, कई बच्चे अनाथ हो गए. आज उन घरों, उन बच्चों, उन बेवाओं और उन बूढी माताओं की सुधि लेने कोई नहीं जाता. उन्हें रंगरूट बनने की ट्रेनिंग देनेवाला अवसरवादी  राजनीतिज्ञ अरबों में खेल रहा है, लेकिन जिसके बूते उसने मंजिल पाई उसका परिवार आज दर-दर की ठोकरें खा रहा है. 

इन रंगदारों के पनपने के बाद नौबतपुर में रंगरूटों की फ़ौज बनती गयी और कालांतर में उनके अन्दर भी रंगदार बनने का शौक पैदा होते गया. अपराध के वातावरण ने नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित किया और संरक्षण ने उन्हें सिंचित किया. रंगदारी से होनेवाली क्षणिक मोटी आय को उन्होंने कैरियर बनाने की सोच ली और असमय काल-कलवित होते चले गए. उनकी आय का पूरा भाग भी उनके कैशियर हड़प गए और परिवार गरीबी की दलदल में गलीच होता गया. 

नौबतपुर में आज भी उस वातावरण का असर है. आज भी उन रंगरूटों की एक छाप है. गैंगवार में रविन्द्र मारे गए, कल्लू और छोटका रविन्द्र की हत्या हुई, पंचम, दिलीप और सरोज के बाद लुल्लन सिंह मारा गया. अब तराढ़ी  की घटना सामने है. मनोज अहुआरा में बाल-बाल बचा था. प्रायः सभी लोगों की हत्याओं में स्वजातीय लोगों के नाम आये. कुछ मामलों में पुलिस का नाम आया लेकिन मुखबिर स्वजातीय बताये गए.

सुरक्षित क्षेत्र में काबिल नेता पैदा नहीं हो सके और कुछ अपराधी प्रवृति के चतुर नेताओं ने क्षेत्र को इस कदर बर्बाद किया की आज मंगल पर बसने की योजना के युग में नौबतपुर अपराध और रंगदारी की ही बात करता है. आज विकसित लोग अपने बच्चों को स्कॉलर और वैज्ञानिक बनाना चाहते हैं तो नौबतपुर की युवा पीढ़ी रंगदारी की वसूली की बात सोचती है, नौबतपुर के लोग अपने बच्चों को पुलिस में भर्ती देने की बात सोचते हैं. आज करोड़ों की आय पाने की होड़ में हमारे बच्चों का एक-एक मिनट कीमती है, लेकिन नौबतपुर में चौक-चौराहों पर नवयुवकों की मंडली बैठती है. देश के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए व्यस्त होना जरूरी है, गरीबी के लिए शिक्षा की जरूरत है, राजनेता के पीछे चलने से निजात पाना जरूरी है. रविन्द्र, सरोज, पंचम, लुल्लन के अंत से सीखने की जरूरत है, संभलने की जरूरत है, नसीहत पाने की जरूरत है.

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