नौबतपुर में फिर वही माया: उजड़ती कोख, धुलती मांग और छिनता साया.

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ताबड़तोड़ हत्याओं से सिहर गया बाजार, थर्रा गया खेत-खलिहान.


Image result for naubatpur murderपुलिस पुरानी रंजिश या आपराधिक इतिहास बताकर पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन किसी की मांग सूनी हो जाती है, किसी का कोख उजड़ जाता है और किसी के सिर से बाप का साया छीन जाता है. एक मौत तीन पीढ़ियाँ बर्बाद करतीं हैं थानेदार!


1991-93 के दौर में नौबतपुर में लगे कई बैरियरों पर विराजमान चौकीदार खौफनाक अपराधियों को देखते ही बैरियर उठा देते थे और आम लोगों की सघन तलाशी ली जाती थी. उन दिनों एक गुट को पालीगंज क्षेत्र के एक जातिवादी नेता और बिहार सरकार के दो मंत्रियों का समर्थन प्राप्त था, जबकि दूसरे पक्ष को  एक स्थानीय नेता का समर्थन मिलता था. क्षेत्र की जनता भी जातीय आधार पर अपने रंगदारों को शेल्टर देती थी. कई लोग इन रंगदारों के संपर्क में रहने का धौंस दिखाते थे.

नौबतपुर एक बार फिर सुलग चुका है. नौबतपुर एक बार फिर दरिन्दगी की सारी हदें पार कर रहा है. यह प्रशासनिक विफलता और प्रतिनिधियों की शिथिलता की ऊपज है . प्रारम्भिक दौर से ही नौबतपुर में आपराधिक गतिविधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है. हर अपराधी किसी-न-किसी राजनीतिज्ञ की छत्रछाया में रहा है.  रंगदारी और एजेंटी की वसूली के लिए नौबतपुर में अक्सर वारदातें हुईं हैं. नाम नहीं छापने की शर्त पर हाल के दिनों में राजनैतिक वर्चस्व को लेकर भी हत्याओं का दौर चला है. राजनेताओं ने नवयुवकों को पिछलग्गू बनाकर उनका भविष्य छीन लिया है, उनकी उर्जा का गलत प्रयोग किया है. हत्या हताशा  का परिणाम है. अंधकारमय भविष्य की घबराहट से युवक अपराध जगत में प्रवेश कर जाते हैं और फिर उनका लौटना मुश्किल हो जाता है.  बेकारी से पैदा होती अराजकता के लिए सरकार की पक्षपातपूर्ण और अदूरदर्शी नीति जिम्मेदार है. चुनावी लाभ के लिए लॉबी और जातीय आग की लपट पैदा करनेवाले राजनीतिज्ञों ने नौबतपुर को एक बार फिर आपराधिक केंद्र बना दिया है. इन भटके युवकों को मुख्यधारा में लाने के लिए गंभीर प्रयास की जरूरत है, लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे नेतागण इन भटके युवकों का प्रयोग अपने राजनीतिक वर्चस्य की लड़ाई में करते हैं.

कुछ वर्षों पूर्व राजनैतिक वर्चस्व में ही पंचम महतो की हत्या की खबर गूंजी थी. वर्षों पूर्व अपराध जगत से राजनीति में कदम रखनेवाले दो नेताओं की नौबतपुर थाना परिसर में पिटाई हुई थी. थाने में पिटनेवाले लोगों के समर्थकों ने इस उकसावा के लिए एक तत्कालीन मंत्री को जिम्मेदार ठहराया था.

नौबतपुर में इन रंगदारों के पैसों के कस्टोडियन की भी चर्चा है . सूत्र बताते हैं कि इन रंगदारों की भागदौड़ की जिन्दगी में कुछ सफेदपोश लोग उनके अवैध कमाई की राशि के सुरक्षित कस्टोडियन की भूमिका निभाते हैं और मोटी राशि जमा होते ही मुखबिरी का काम भी कर देते हैं. नौबतपुर में रंगदारी की वसूली होती रही है, लेकिन हत्या के बाद किसी भी रंगदार की पारिवार की माली हालत में सुधार नहीं देखा गया है. कस्टोडियन लोगों ने राशि हजम कर ली है और जान मुख्यधारा से  भटके युवकों की गयी है. क्षेत्र में ऐसी भी चर्चा है की कुछ व्यापारिक घरानों ने अपने व्यापारिक प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने के लिए भी इन अपराधियों का इस्तेमाल करते रहे हैं.

सूत्रों के अनुसार नौबतपुर में लुल्लन सिंह की हत्या के दो आयाम हैं.  चर्चा है कि रंगदारी की वसूली और राजनैतिक वर्चस्व को लेकर लुल्लन की हत्या हुई. तरारी में युगल मर्डर के पीछे भी गैंगवार और पुरानी आपराधिक रंजिश को कारण बताया गया. नौबतपुर बाजार में रंगदारी की वसूली और लुल्लन की हत्या के बदले की कार्रवाई में एक और शख्स मारा गया. अमरपुरा लॉक पर दिनदहाड़े छोटी टेंगरैला के उदय सिंह और रामाधार सिंह की हत्या के बाद एक बार फिर बड़ी टेंगरैला के दो लोगों को गोली मारी गई है.

नौबतपुर थाना से महज दो-तीन सौ मीटर की दूरी पर लुल्लन को गोली मारी गई. नौबतपुर बाज़ार में ही लुल्लन के प्रतिशोध में एक और हत्या हुई. नौबतपुर से अमरपुरा बाज़ार की दूरी महज दो किलोमीटर है और भीड़भाड़ वाला बाजार है, लेकिन ताबड़तोड़ होती हत्याओं में मौके वारदात पर कोई गिरफ्तार नहीं होता. समय-समय पर नौबतपुर में लगनेवाला सारा बैरियर आम लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है और अपराधी बेख़ौफ़ घूमते हैं. 1991-93 के दौर में बैरियर पर विराजमान चौकीदार खौफनाक अपराधियों को देखते ही बैरियर उठा देते थे और आम लोगों की सघन तलाशी ली जाती थी.

पुलिस की निद्रा से बेख़ौफ़ अपराधी अपना तांडव मचाने लगे हैं. पटना पुलिस अपधियों की फरारी के बाद खानापूर्ति में जुट जाती है. पुलिस पुरानी रंजिश या आपराधिक इतिहास बताकर पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन किसी की मांग सूनी हो जाती है, किसी का कोख उजड़ जाता है और किसी के सिर से बाप का साया छीन जाता है. एक मौत तीन पीढ़ियाँ बर्बाद करतीं हैं थानेदार!

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