पटना जिला परिषद्: राशि आवंटन की गूंजती आवाज़ या नई बोतल में पुरानी शराब

राशि की वास्तविक मांग या नक्कारखाने में तूती की आवाज़.


कल्याणपुर-इजरता मार्ग में लगभग सात सौ मीटर सड़क निर्माण में सामग्री और निर्माण का स्तर घटिया रहा. पीच के नीचे की बिछाई और काली पट्टी में समझौता हुआ. मिटटी किसानों के खेत से ले लिए गए और भुगतान सरकारी खजाना से दिखाया गया. किसानों का एक बार फिर शोषण हुआ, आज एक वर्ग फीट की भराई में सात रूपये खर्च होगा. लेकिन शोषक जनसेवक की भूमिका भी दर्शा गया. 


योजनाओं और आवंटित राशि की जानकारी सार्वजनिक करने का साहस आज तक किसी भी पार्षद ने नहीं किया.


कल्याणपुर में लगभग साढ़े चार लाख रूपये की लागत से पन्नों पर पुलिया का निर्माण हुआ,


खानपुरावासी को आज भी साढ़े आठ लाख की लागत से कागज पर निर्मित यात्री शेड की तलाश है.


सूचना के अधिकार के प्रयोग पर जिला परिषद् का पूरा कुनबा सक्रिय हो जाता है. भावनात्मक बातों का दौर भी चलता है, सांकेतिक धमकियां भी चलतीं हैं. 


प्रायः विजेताओं ने चुनाव में कोई घोषणापत्र भी जारी नहीं किया था. मतदाताओं ने इसकी जरूरत भी नहीं समझी थी. 


जिला परिषद् की बैठक में कुछ पार्षदों ने भवन के जीर्णोधार की बात को दरकिनार कर क्षेत्र के लिए राशि आवंटन की मांग की. भवन के जीर्णोधार की मांग भी जिला परिषद् अध्यक्ष की ही थी. अध्यक्ष जदयू की हैं. चुनाव में दलीय गठजोड़ खूब चला था. मतदान दलगत आधार पर ही हुआ था. यदि विकास के लिए राशि आवंटित की जाती है तो अच्छी बात हो सकती है, लेकिन जिला पार्षदों के विकास कार्यों की समीक्षा जरूरी है. उन लोगों के कार्यों की समीक्षा भी जरूरी है जो किसी न किसी रूप में पंचायत प्रतिनिधि रहे हैं. उनका कार्यकलाप उनकी मंशा, सोच और समर्पण को स्पष्ट कर देता  है.

पालीगंज क्षेत्र संख्या 17 में एक खानपुरा गाँव है. गाँव वाले आज भी खानपुरा में कागज पर निर्मित यात्री शेड की तलाश करते हैं. तलाश के साढ़े पांच वर्ष तो बीत चुके हैं, लेकिन आज तक नहीं मिला खानपुरा का नवनिर्मित यात्री शेड. जिला परिषद् क्षेत्र संख्या 15 के कल्याणपुर गाँव में लगभग साढ़े चार लाख रूपये की लागत से पुलिया बना था. पुलिया का निर्माण पन्नों पर पूरा हो गया, लेकिन वास्तविकता से पूरा क्षेत्र वाकिफ है. राशि की बंदरबांट तो हो गई, लेकिन पुलिया एक दिन के लिए भी चालू नहीं हुआ.

स्थिति इतनी भयावह है की सूचना के अधिकार में राशि की जानकारी मांगने पर जिला परिषद् कार्यालय बीच-बचाव और समझौता के मूड में उतर जाता है. यदि आवेदक जिद पर अड़ गया तो कई बार तो आवेदक को टहला दिया जाता है. आवेदन प्राप्तकर्ता के कई बदले हुए नाम बतलाये जाते हैं. आवेदन प्राप्त करने की स्थिति में सम्बन्धित पार्षद को तत्काल आवेदक का विस्तृत विवरण उपलब्ध करा दिया जाता है और आवेदक के ऊपर जिला पार्षद दबाव पैदा करते हैं. भावनात्मक बातों का दौर भी चलता है, सांकेतिक धमकियां भी चलतीं हैं. 

जिला परिषद् कार्यालय के कुछ कर्मचारी आवेदन को रिजेक्ट करने की धमकी देते हैं और अपना कुछ भी नहीं बिगाड़ने का दंभ भी भरते हैं. स्थिति इतनी भयावह है कि जनता को पूरी योजना की जानकारी तक कभी भी नहीं दी गई, लेकिन सदन में राशि आवंटन की गूंज तो सुनाई पड़ती है. आवंटित राशि की जानकारी देने का साहस आज तक किसी भी पार्षद ने नहीं की है. सारी योजनाओं की जानकारी जनता को नहीं दी गई.

कल्याणपुर-इजरता मार्ग में लगभग सात सौ मीटर तक निर्मित सड़क ठेकेदार ने बनाया. निर्माण और सामग्री का स्तर घटिया रहा. पीच के नीचे की बिछाई में समझौता कर लिया गया, काली पट्टी में कमी झलकती है. मिटटी किसानों के खेत से ले लिए गए और उसका भुगतान सरकारी खजाना से हुआ. किसानों का एक बार फिर शोषण हुआ, लेकिन ठेकेदार और सम्बंधित अधिकारी मालामाल होते रहे. किसानों के खेत तालाब बना दिए गए और जनसेवक की भूमिका भी दर्शाने की कोशिश हुई. ग्रामीणों को न तो प्राक्कलित राशि बताई गई, न ही उन्हें प्राक्कलन दिखाया गया. सुनियोजित साजिश के तहत सड़क के पक्कीकरण का सब्जबाग दिखलाकर उनके खेतों को तालाब बना दिया गया. बगल में आहर है. आहर से मिटटी ली जा सकती थी, लेकिन भू-धारकों को अँधेरे में रखा गया. आज उन गढ़ढों की भराई में सात सौ रूपये प्रति वर्ग फीट का खर्च आयेगा. जनता के ऐसे शोषकों से जनहित में समुचित विकास की उम्मीद बेमानी लगती है.  जिला परिषद् में गूंजनेवाली ऐसी आवाजे नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित होती रही है.

चुनाव में पैसे की लुटाई के बाद समर्पण का भाव पीछे रह जाता है, वसूली की प्रक्रिया चल पड़ती है. जनहित के मसले तो पांच वर्षों पर आते है, भरपाई का दौर पांच वर्षों तक लगातार चलता है. देखना है, जिला परिषद् की आवाज़ धरातल पर कब और किस रूप में उतरती है. सरसरी तौर पर तो नई बोतल में पुरानी  शराब की दुर्गन्ध आती है. खैरियत है, प्रायः विजेताओं ने चुनाव में कोई घोषणापत्र भी जारी नहीं किया था. मतदाताओं ने इसकी जरूरत भी नहीं समझी थी. 

One thought on “पटना जिला परिषद्: राशि आवंटन की गूंजती आवाज़ या नई बोतल में पुरानी शराब

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *