पालीगंज एक्सप्रेस की खबर पर मुहर- 9 अगस्त को मंजूषा ने लिखा था: ‘ पांच सौ रूपये पर पत्थर फेकनेवालों का लोकतंत्र’

वोट, सपोर्ट एंड डेमोक्रेसी ‘फॉर सेल’. ‘फॉर सेल’. चुनावी नौकरी महज एक माह की होती है.

जब लोकतंत्र का स्तम्भ ठेकेदारी हो जाए तो देश को ठिकाना लगने में कितनी देर होगी?
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MANJUSHA RANJAN*पांच सौ रूपये पर पत्थर फेंकनेवालों के हाथों लोकतंत्र: मंजूषा. POSTED ON  समस्या से सभी वाकिफ हैं, समाधान भी सभी जानते हैं, कोई कुछ करना नहीं चाहता. भ्रष्ट प्रत्याशियों के प्रचारकों का डोजियर तैयार करें तो  नब्बे फीसदी अपराधी निकलेंगे  READ MORE 



भ्रष्ट लोगों की लाटरी खुल गई है. आज लोकतंत्र हर कदम पर हार जाता है, ईमानदारी भ्रमित हो जाती है, नैतिकता पराजित हो जाती है और पारदर्शिता उपेक्षित हो जाती है.  


कई लोग प्रचार में निकलने की तिथि परिवर्तित करते जाते हैं और अपने प्रबल विरोधी प्रत्याशी से चार-पांच हजार रूपये तक वसूल कर मौन हो जाते हैं.  किसी के पास हाई कमान के दबाव का बहाना है, कोई रिश्तेदार और नजदीकी का ताना देकर चुप हो जाता है. कोई सर्वेयर बन जाता है, कोई चुनावी समीकरण का ज्ञाता बन जाता है. कुछ लोग अपनी पराजय की कीमत वसूलते हैं तो कुछ लोग सात पुश्तों की दुश्मनी याद करते हैं. 


एक बिकाऊ खेमा प्रचार वाहन में बैठ कर गुमनान सर्वेयर बना होता है और प्रचार के दौरान कोने और कमरों का उपयोग ज्यादा करता है. प्रचार के काफिलों में ऐसे लोग अक्सर पिछड़ जाते हैं और मतदाताओं के बीच गलत सन्देश देने की कोशिश करते हैं. इनका मिशन प्रचार गाड़ियों में बैठकर दुष्प्रचार का होता है.


मेरे दावों की सत्यता प्रमाणित: मंजूषा. पालीगंज एक्सप्रेस पर 9 अगस्त को मैंने पोस्ट किया था- 500 रूपये पर पत्थर फेकनेवालों का लोकतंत्र. आज कश्मीर से लौटे मजदूरों के बयानों से इसकी पुष्टि हुई.


 पालीगंज एक्सप्रेस पर मैंने भारत में लोकतंत्र के उड़ते मजाक पर एक लेख लिखा था. नामांकन, रैली और प्रचार से लेकर विरोध और प्रदर्शन तक में पैसों के चलन पर टिप्पणी की गई थी. लेख में लोकतंत्र के खुलेआम चीरहरण और बिकाऊ लोगों के खरीदे गए समर्थन पर प्रहार किया गया था. मैनें दावा किया था की कश्मीर में भी पत्थर फेंकनेवाले 500 रूपये पर खड़ा किये जाते हैं, उनके अन्दर विरोध या समर्थन का कोई भाव नहीं है. उनके सामने मजबूरी है. गरीबी, भय या भूखमरी  जनित मजबूरी को पैसों के भुगतान पर कैश करा लिया जाता है. आज गरीबों और निर्बल लोगों की मजबूरी को पैसों के बदौलत कैश करा लिया जाता है. भ्रष्ट लोगों की लाटरी खुल गई है. अनैतिक लोग पैसों के दबाव में अनमनस भाव से मजबूर लोगों का समर्थन प्राप्त कर लेते हैं और लोकतंत्र हर कदम पर हार जाता है, ईमानदारी भ्रमित हो जाती है, नैतिकता पराजित हो जाती है और पारदर्शिता उपेक्षित हो जाती है.

आज इस पेड समर्थन को ही दर्शा कर चुनावी जीत हासिल कर ली जाती है. किसी को अपमानित कर दिया जाता है, मानवता शर्मसार हो जाती है, लोकतंत्र बिक जाता है. आज मत, समर्थन और लोकतंत्र को सेल पर रखा गया है.

कश्मीर से लौटे मजदूरों ने इस सत्य को स्वीकार किया है. अररिया जिले के नरपतगंज प्रखंड के कई मजदूरों ने इस सच से पर्दा हटाया है. दिलशाज, इरशाद, नसर, मोजिउल, जियाउल, मुस्ताक, मोजीम, मुस्लिम, रहीम आदि मजदूरों ने आतंकवादियों के दबाव में महज पांच सौ रूपये पर पत्थर फेकने की बात को स्वीकार किया है. इन लोगों को भारतीय सैनिकों, पुलिस और सीआरपीएफ  के जवानों पर पत्थर फेकने के लिए मजबूर किया जाता है. इनके गुजरते काफिलों पर इन्हें दिन भर पत्थर फेकना होता था. पैसा प्राप्त करनेवाले लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी.

भारत में चुनाव के दौरान भी ऐसी ही स्थिति होती है. किसी को अपने परिवार के सदस्य की बीमारी के इलाज के लिए कुछ पैसे दे दिए जाते हैं. किसी के घर शादी में कुछ पैसे गिफ्ट के रूप में दे दिए जाते हैं. किसी की जेब में जेब खर्च के नाम पर पांच सौ रूपये रख दिए जाते हैं. किसी को समर्थकों में आनेवाले खर्च के नाम पर हजार-दो हजार दिए जाते हैं. कोई मुर्गा खाने के लिए पैसे लेता है तो एक जमात मुर्गा-दारू की लालच में पांच सौ-हजार रूपये स्वीकार कर लेती है. नामांकन के लिए प्रति व्यक्ति एक सौ रूपये और भरपेट खाना का प्रलोभन मिलता है. रैली में भागीदारी के लिए डेढ़ सौ रूपये प्रति व्यक्ति का रेट निर्धारित है. इस कार्य को अंजाम देनेवाले मेठ सौ रूपये पर भी काम चला लेते हैं. शेष राशि उनकी जेब में जाती है. मतदान के एक-दो दिन पूर्व एक परिवार को पांच सौ रूपये तक की राशि दी जाती है, लेकिन थोड़ी फूहड़पन दिखानेवाले अनुभवी मतदाताओं को एक हजार रूपये तक की राशि भी मिल जाती है. दैनिक प्रचारकों को औसतन पाच सौ रूपये की दर से एक माह के लगभग पंद्रह हजार रूपये मिलते हैं, चुनावी नौकरी भी महज एक माह की है. इनकी भूमिका ऑर्गनाइजर की होती है. रैली, नामांकन से लेकर बूथ मैनेजमेंट और मतदाताओं के बीच पैसों के वितरण से बड़बोलेपन तक की ठेकेदारी इन्हें मिलती है. प्रतिदिन पचास रूपये से एक सौ रूपये पर प्रचारकों की व्यवस्था की जिम्मेदारी भी इन्हें निभाना होता है. नामांकन के पूर्व ही पांच सौ रूपये का भुगतान पाकर गली-चौक-चौराहों और बाजारों में बजनेवालों की भी एक जमात है. इन्हें दस-पंद्रह दिनों पर पांच सौ रूपये की किश्त दी जाती है. इनका काम एक उम्मीदवार के पक्ष में बजना है. इन्हें सर्वश्रेष्ठ और ईमानदार उम्मीदवार के विरोध में बोलने की जिम्मेदारी भी दी जाती है. मतदान के पूर्व चौक-चौराहों पर ही जीत का मौखिक प्रमाणपत्र बांटने का फर्ज भी इन्हें निभाना होता है. चुनाव में पैसों की धमक की अनिवार्यता को स्थापित करने की ठेकेदारी इन्हें मिल चुकी होती है.

एक अन्य पेड खेमा है. वह अन्य जातियों के मतों को धनबली उम्मीदवार के पक्ष में गोलबंद बताने की कवायद प्रारंभ कर स्वजातीय मतों की गोलबंदी का आधार बनाता है. यह बिकाऊ खेमा भुगतान करनेवाले उम्मीदवार को हर हाल में विजयी बनाने की मजबूरी बताकर स्वजातीय प्रत्याशी को जीत दिलाने की मुहिम चलता है. अन्य दूसरे स्वजातीय लेकिन पारदर्शी प्रत्याशियों को स्वजातीय मतों तक सिमटे होने का दावा कर उन्हें संघर्ष से बाहर करने की रणनीति चलनेवाला भी एक पेड खेमा है. ठेकेदारी में कमीशनखोरी और केसीसी में बैंकों की दलाली करनेवाले लोग भी अब प्रत्याशी बनते हैं और अपनी दलाली को जनसेवा के रूप में दर्शाते हैं. थाना और ब्लाक के दलाल अब राजनीतिज्ञ बन गए हैं क्योंकि उन्होंने नाजायज सम्पत्ति अर्जित कर ली है और चंद टुकड़े बिछाकर जीत हासिल करना चाहता है.

एक पेड खेमा गाँव-गाँव जाकर बिकाऊ लोगों के बीच पैसा का प्रलोभन देता है. एक खेमा विरोध में बोलकर ध्यान आकर्षित करने की मुहिम चलाता है और फिर चंद रूपये की वसूली कर अपनी जाति में सीट बचाने के तर्क के साथ निंदनीय के पक्ष में चला जाता है.

एक अन्य खेमा कई प्रत्याशियों को नामांकन के लिए उत्प्रेरित और प्रोत्साहित करता है, चुनाव में प्रचार करने और जीत दिलाने की गारंटी देता है. मतदाताओं का ईमानदार खेमा तो अपनी इस प्रतिज्ञा पर कायम रहता है, लेकिन बिकाऊ खेमा कई तरह की मजबूरियों के साथ मुकर जाता है. कई लोग प्रचार में निकलने की तिथि परिवर्तित करते जाते हैं और अपने प्रबल विरोधी प्रत्याशी से चार-पांच हजार रूपये तक वसूल कर मौन हो जाते हैं.  किसी के पास हाई कमान के दबाव का बहाना है, कोई रिश्तेदार और नजदीकी का ताना देकर चुप हो जाता है. कोई सर्वेयर बन जाता है, कोई चुनावी समीकरण का ज्ञाता बन जाता है. कुछ लोग अपनी पराजय की कीमत वसूलते हैं तो कुछ लोग सात पुश्तों की दुश्मनी याद करते हैं. 

एक बिकाऊ खेमा प्रचार वाहन में बैठ कर गुमनान सर्वेयर बना होता है और प्रचार के दौरान कोने और कमरों का उपयोग ज्यादा करता है. प्रचार के काफिलों में ऐसे लोग अक्सर पिछड़ जाते हैं और मतदाताओं के बीच गलत सन्देश देने की कोशिश करते हैं. इनका मिशन प्रचार गाड़ियों में बैठकर दुष्प्रचार का होता है. इन लोगों का जुड़ाव कई प्रत्याशियों से होता है और सभी से पैसा वसूलने की कोशिश करते हैं. ये पुराने लोग हैं और अपनी इस खुराफात से कई लोगों को कैश कराने में सफल भी हो जाते हैं. कुछ जगह विफल भी होते है. लेकिन इनका मत कमजोर प्रत्याशी के पक्ष में जाता है जिसकी जीत होने पर इनकी ठेकेदारी सुनिश्चित हो.

जब लोकतंत्र का स्तम्भ ठेकेदारी हो जाए तो देश को ठिकाना लगने में कितनी देर होगी? आज भारत के खिलाफ पाक आग उगलता है तो राजनीति मतों की ठेकेदारी की भाषा बोलने लगते हैं. सन 1971 में पाक-भारत युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष में होने बाद भी कहा था- ‘देश एक है, देश का नेता एक है.’ लेकिन आज ठेकादारों के हाथों गिरवी सत्ता में ‘लोकतंत्र’ शब्द शब्दकोश में सिमट कर रह गया है. एक भारी जमात चंद रूपयों पर लोकतंत्र को गिरवी रख देती है.  अनाड़ी और अनैतिक के पक्ष में मुहिम चलाकर शराब की घुटों के साथ देश को बेचने पर सहमति बन जाती है. परिणाम सामने है. राजनीति अपराधियों और भ्रष्टाचारियों की रखैल बन गई है. पाक जैसा छोटा-सा देश आखें दिखा रहा है. हमारे मारे जा रहे जवान गरीब परिवारों से आते हैं. गरीबी बढ़ती जा रही है. जनसेवक तानाशाह बन गए हैं. निजीकरण के दौर में स्कूल और नर्सिंग होम हमें कंगाल बना रहे हैं. अपारदर्शी और सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था हमें नर्वस कर चुका है. भ्रष्टाचार हमें खोखला कर गया है. हम कुपोषण , गैरविकासवाद और असुरक्षा की समस्याओं के बीच आतंकवादी और उग्रवादी गतिविधियों से आहत हैं. देश की सुरक्षा खतरे में है, लेकिन भ्रष्ट अनैतिक राजनीतिज्ञ देशहित के मसलों में भी अपनी राजनैतिक जमीन तलाश रहे हैं. कारण, भ्रष्टाचारियों के अवगुणों को गुण बतलाकर उन्हें विजयी बनाने के लिए 500 रूपये पर बिकनेवाले दलालों की बेकार फ़ौज अगले चुनाव का इंतज़ार कर रही है. 

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