पालीगंज : ५५ वर्ष बनाम १५ वर्ष, फिर पिछड़ापन क्यों?

अक्सर पिछड़ा  एमएलए, फिर पिछडापन क्यों?

पालीगंज विधानसभा की जनता को अब तक मूर्ख बनाया गया है. अगड़ों और पिछड़ों की राजनीति का राग अलापकर राजनीतिज्ञों ने अपनी रोटी सेंकी है. पालीगंज की जनता आपस में कभी भी टकराना नहीं चाहती है. आरक्षण के दौर में पालीगंज एक मात्र एसा बाज़ार रहा जहाँ न तो बाज़ार बंद का नजारा देखने को मिला, न ही आपसी तनाव का वातावरण बना. सभी जाति के लोगों में भाईचारा का वातावरण रहा. पालीगंज बाज़ार में जातीय आधार पर हिंसा की एक भी घटना अब तक नहीं घटी है. बाज़ार में किसी भी जाति का दबदबा कायम नहीं है. लाखों रूपये निकालकर लोग आराम से बाज़ार में विचरण करते है. कोई भी जाति का व्यक्ति कहीं भी कोई भी व्यापार कर सकता है. पालीगंज धार्मिक उन्माद या फसाद की घटनाओं का भी गवाह नहीं रहा है. लेकिन चुनाव के समय जीत दर्ज करने के लिहाज़ से पालीगंज में जातीय राजनीति की रणनीति अपना ली जाती है. यह तीखापन राजनीतिप्रेरित रहता है. 

पालीगंज का र्राजनैतिक इतिहास देखें तो यहाँ अगड़ा और पिछड़ा की बेकार की पृष्ठभूमि बनायी जाती है. पालीगंज में पिछड़ों और दलितों का शोषण का मसला व्यर्थ जान पड़ता है. इस विधानसभा का दक्षिणी भाग पिछड़ापन और अशांति के लिए जाना जाता है. इन क्षेत्रों के एक बड़े रकबा को लाल इलाका कहक जाता है, जहाँ दिन के उजाले में जाने की मनाही रही है. सिगोड़ी और चिकसी एवं नादहरी सहित इमामगंज क्षेत्र का पूरा इलाका दिन के उजाले में भी डरावना लगता है. इन क्षेत्रों की सड़कें आज भी अविकसित हैं. प्रकाह्न्द मुख्यालय से इन क्षेत्रों की काफी दूरी है. कई गाँवों के लोगों का बाज़ार किंजर और जहानाबाद है. कई गाँवों के लोगों का पटना आवागमन भी वाया जहानाबाद होता है. सड़कें जर्जर हैं, क्षेत्र अविकसित होने की वजह से सुनसान है. नदियों पर जर्जर या धंसी पूलों से आवागमन बाधित है. कई इलाको में पुलिस का पहुँचाना दूभर है. शिक्षा का आभाव है और बेरोजगारी जटिल समस्या है. फलतः इन क्षेत्र्रों में असमानताजनित नक्सलवाद है, नादानी से पनपी अराजकता है, शोषण से उत्पन्न जातिवादी नफ़रत है. 

पालीगंज मा पिछड़ों और डेल्टन की आबादी काफी है. क्षेत्र में यादवों की संख्या सर्वाधिक है और दिग्गज पिछड़े नेताओं की बाढ़ रही है. सवर्णों के खिलाफ आग उगलनेवाले कद्दावर पिछड़े नेताओं के शोषण से पालीगंज की पिछड़ी जातियां अभी भी संकट से जूझ रहीं हैं. १९५१ सा २०२० तक का हिसाब करें तो महज १५ वर्षों तक पालीगंज  की विधायिकी सवर्णों के हाथ में रही है और शेष ५५ वर्षों तक नेतृत्व पिछड़ों ने किया है. रामलखन सिंह यादव जैसे कद्दावर नेता पालीगंज से २५ वर्षों तक जीत हासिल की है. यादव प्रदेश और केंद्र में मंत्री भी रहे हैं, लेकिन सूत्रों की मानें तो रामलखन सिंह ने पिछड़ों की स्थाई तरक्की के उपाय पर बल नहीं दिया. उनके सेवक आज भी सेवक की स्थिति में ही रह गए और उन्हें अति महार्वाकंक्षी बनने की आज़ादी नहीं दी गई. यादव वंशवादी राजनीति के लिए जाने जाते हैं और आज भी पालीगंज की बागडोर उनके पौत्र के हाथ में है. बच्चा यादव के द्क्र्यकाल को जोड़ दिया जाये तो पालीगंज का नेतृत्व ३० वर्षों तक रामलखन सिंह यादव के परिवारवालों के पास रहा. प्रदेश और केंद्र में मंत्रालय संभालनेवाले चंद्रदेव प्रसाद वर्मा १५ वर्षों तक पालीगंज के विधायक रहे. पांच वर्षों की अवधि दीनानाथ यादव के जिम्मे रही. शेष पांच वर्ष नन्द कुमार नंदा पालीगंज की शोभा बढ़ाते रहे और वामपंथ दे टिकट पर चुनाव जीतकर दक्षिणपंथी राजनीति के अनुसरणकर्ता बन बैठे. पालीगंज की सत्ता ३५ वर्षों तक यादव एमएलए के हाथों रही और २० वर्षों की राजनीति कोइरी जाति के प्रतिनिधियों के हाथों में थी. पंद्रह वर्षों तक भूमिहार को पालीगंज की विधायिकी मिली. 

द्क्र्यकाल को देखने के बाद यह कहा जा सकता है की पालीगंज के पिछड़ों और दलितों के गैर्विकसवादी स्वरूप के लिए रामलखन सिंह यादव की वंशवादी राजनीती ही सर्वाधिक जिम्मेदार है. पैढ़स वर्षों के शासनकाल में यादव बहुल पालीगंज क्षेत्र का एकसमान विकास नहीं हुआ. क्षेत्र भौतिक और आर्थिक रूप से पिछड़ापन की मिशाल कायम करत है. क्षेत्र के यादव आज भी गरीबी, बेरोअजगारी और अज्ञानता के शिकार हैं. इलाका महतो बहुल भी है लेकिन उनके गाँवों का पिछड़ापन भी कमाल का है. कोइरी जाति में गरीबी और अशिक्षा के साथ ही बेरोजगारी लाजबाब है. चुनावी दौर में इनके अन्दर जातीय रंग भरकर आसान जीत दर्ज करना सरल है.

क्षेत्र में दलितों की काफी तादाद है और और उनकी दयनीय स्थिति भी विकराल है. मुस्लिमों की निर्णायक क्षमता का भरपूर जज्वाती लाभ लिया जाता रहा है, लेकिन उनके गाँवों को अब तक छला गया है. सवर्णों की तो बिहार में लगातारअदादों के नाम पर लगातार उपेक्षा होती रही है. उनके ऊपर अगड़ा का चस्पा इस उद्देश्य से ही लगाया गया है.  

अभी तक पालीगंज का चुनाव जातीय रंग देकर जीता जाता रहा है. जब-जब जातीय रंग देने की कोशिश नाकाम हुई है तब तब सवर्ण प्रतिनिधि की जीत हुई है. लेकिन पिछड़े नेताओं की जातिलीला पिछड़ों और दलितों के लिए ही जमीन तैयार करती है और उनकी जीत सुनिश्चित हो जाती है, वंशवादी राजनीति की स्थापना की राह आसन हो जाती है. जातीय रंग में सराबोर पालीगंज इन नेताओं से विकास की खबर नहीं लेती और इनकी नैया पार लगा जाती है. अलबत्ता जनता की विकास की गाडी रुकी हुई है.

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