क्या पालीगंज में शिक्षक की मौत के बाद भी अस्पतालों की दुर्दशा पर जयवर्धन को जन-आवेदन चाहिए?

बी. बी. रंजन की कलम से-

पिछले दो माह से बी. बी. रंजन ने पालीगंज अनुमंडलीय अस्पताल के उपाधीक्षक से सियारामपुर, अकबरपुर, समदा, कल्याणपुर सहित कई अस्पतालों की दुर्दशा और पालीगंज अस्पताल के चिकित्सकों की फरारी पर सवालों की निरंतरता रखी थी. बी. बी. रंजन ने सियारामपुर के मुखिया नरेश सिंह और कांग्रेस नेता अभय सिंह से भी इस मसले पर सक्रियता बरतने की अपील की थी. शिक्षक विशुनदेव सिंह के असामयिक मौत के महज एक दिन पूर्व पालीगंज एक्सप्रेस न्यूज़ पोर्टल के संपादक बी.बी. रंजन ने अस्पतालों से डॉक्टरों और नर्सों की फरारी की ओर पालीगंज के विधायक बच्चा यादव से सवाल किया था. सवालात के बाद भी सतर्क नहीं हुए थे पालीगंज विधायक जयवर्धन. समाचारपत्रों की सुर्खियाँ बटोर संतुष्ट हो जाते हैं तेजप्रताप. विधायक जी! डॉक्टरों की लापरवाही से एक और मौत हो गई, क्या आपको अब भी जन-आवेदन चाहिए? पीड़ित किसी जाति और धर्म का हो सकता है. कहने को गरीबों की सरकार है, २७ वर्ष पुराना सामाजिक न्याय का नारा है, दलित- दमन के खिलाफ कड़े तेवर की ढिढोरेबाजी है. जमीन पर बने रहने के दावेदार जनप्रतिनिधियों की नींद कब टूटेगी? अभी कितनी मौतें चाहिए? 

पालीगंज एक्सप्रेस लगातार पालीगंज अनुमंडलीय अस्पताल के उपाधीक्षक से अस्पतालों की दुर्दशा पर सवाल कर रहा था और उपाधीक्षक दबी जुवान से गलतबयानी कर रहे थे. उपाधीक्षक अस्पतालों की स्थिति सुधारने का झूठा आश्वासन दे रहे थे. पालीगंज में जनकार्यों के प्रति समर्पित होने का दंभ भरनेवाला एक भी प्रतिनिधि ने अस्पतालों की दुर्दशा पर एक शब्द कहने की जुर्रत नहीं की. अधिकारियों की चापलूसी में कई जनप्रतिनिधियों की चप्पलें घिस जातीं हैं. कई जनसेवक दलाल की भूमिका अदा करते हैं. कई जनसेवकों की बिचौलियागिरी की चर्चा है. प्रखंड कार्यालयों में अक्सर चेहरा चमकाने का दंभ भरनेवाले आधुनिक जनप्रतिनिधियों के कार्य धरातल पर नहीं दिखते, उनकी उपस्थिति मीडिया मैनेजमेंट की बदौलत फोटो ऑप तक है. कार्यालयों में दैनिक उपस्थिति से जन-समस्याओं का निराकरण नहीं होनेवाला, धरातल पर कार्य के प्रति सक्रियता की जरूरत है.

पंचायत चुनाव के दौरान मंजूषा कुमारी उर्फ़ मंजूषा रंजन ने अपने घोषणापत्र में  अस्पतालों की दुर्दशा और इनके बिगड़ते हालात को सुधारने की ललकार लगाई थी. अन्य किसी प्रत्याशी ने तो घोषणापत्र जारी तक करने की जहमत नहीं उठाई थी. मंजूषा क्षेत्र में अस्पतालों के बिगड़े हालत पर अक्सर सिविल सर्जन, उपाधीक्षक और विधायक को कटघरे में खड़ा करतीं रहीं हैं.

कल पालीगंज के एक शालीन शिक्षक की मौत हुई. पहले उदय सिंह की मौत हुई थी. एक अन्य दुर्घटना के बाद फरार चिकित्सकों का सच सामने आया था और उन दिनों बी.बी. रंजन के सम्पादन में प्रकाशित हो रहे हालत-ए-पंचायत की पहल पर एस डी एम और सिविल सर्जन सक्रिय हुए थे और आनन्-फानन में फरार तत्कालीन प्रभारी को हटाकर डॉ.  शिवलाल चौधरी को प्रभार दिया गया था. तत्कालीन प्रभारी को हटाने की सूचना भी सर्वप्रथम हालत-ए-पंचायत से मिली थी. लेकिन शिवलाल चौधरी का ठिकाना भी खगौल का मौर्य विहार है. पालीगंज खानापूर्ति मात्र है.

मृदुभाषी और मिलनसार शिक्षक विशुनदेव सिंह की जान बच सकती थी, लेकिन सुशासन बाबू की सरकार में अस्पतालों में सुधार और सरकार की उपलब्धियां पेपरों पर गिना दीं जातीं है, मरीजों को तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता है. पालीगंज की जनता इस तरह की मौत पर चंद घंटों के लिए बिलखती है, अफरा-तफरी मचता है, लोगों की सक्रियता जगती है और चंद दिनों के बाद स्थिति सामान्य हो जाती है. परिजन भी जनप्रतिनिधियों की मातमपुर्सी की औपचारिता को सहृदयता और कर्तव्यपालन मान लेते हैं. मामला ख़त्म हो जाता है. फिर, अस्पतालों की लापरवाही अगले मौत पर सामने आती है, जनप्रतिनिधियों का दान-पात्र चुनावी दौर में खुलता है. चंद मिनटों की मातमपुर्सी पर जब मतों की गारंटी मिलती है तो फिर अस्पताल की दुर्दशा को सुधारने की परेशानी कोई क्यों झेले. मातमपुर्सी करनेवाले जनप्रतिनिधियों को दुत्कार के साथ दफा करने की जरूरत है, क्योकिं अस्पतालों की दुर्दशा से होनेवाली मौतों के प्रति उनकी जिम्मेदारी बनती है. इस जिम्मेदारी की भरपाई मातमपुर्सी से कर ली जाती है और जनता की वाहवाही भी मिलती है. इस सिंबॉलिक राजनीति का चक्र चलता रहेगा और डॉक्टरों की लापरवाही से कल फिर कोई एक बेवश बंदा की  मौत होगी. फिर वही करलव, वैसा ही हंगामा, झूठी मायूसी और मातमपुरसी में दो लुभावने शब्दों का उच्चारण और दो-चार दिनों के बाद अस्पतालों में वैसी ही अराजकता. हम ७०वीं स्वतंत्रता दिवस मना चुके हैं, लेकिन स्थिति उतरोत्तर विकट होती गई है. पहले उदय बाबू की मौत हुई, आज विशुनदेव बाबू नहीं रहे, कल मेरी बारी हो सकती है, परसों कतार में आप हो सकते हैं और तरसों कोई और…………………….. राजनेताओं को मातमपुर्सी की कीमत चाहिए. अस्पतालों की दुर्दशा पर जयवर्धन यादव को जनावेदन चाहिए, अंचल कार्यालयों में सर्वाधिक समय देने का दावा करनेवाले कई स्थानीय नकारा प्रतिनिधियों को इन्ही तानों के साथ जीत की गारंटी चाहिए. अस्पतालों की दुर्दशा पर इनकी सक्रियता कब बनेगी ताकि कल कोई दूसरा विशुनदेव सिंह पालीगंज को अलविदा न कह दे, दूसरे उदय सिंह की मातमपुर्सी की नौबत न जाये. पालीगंजवासियों को मातमपुर्सी और स्थायी निदान में एक को चुनना होगा, दूसरे विशुनदेव सिंह को बचाने की पहल अभी से करनी होगी. अब तो देख ली हमने तेरी बहुत सरदारी रे……………

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