महाबलीपुरम पंचायत में मुखिया का अपमान जनाक्रोश का परिणाम: बी. बी. रंजन.

पालीगंज एक्सप्रेस की पड़ताल… …….


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महाबलीपुरम पंचायत में मुखिया को अपमानित करने की घटना अपारदर्शिता और विभागीय शिथिलता से उपजा जनाक्रोश का परिणाम: बी. बी. रंजन.

आज महाबलीपुरम की घटना पर ताम-झाम दिखानेवाले अधिकारियों का दल आरटीआइ के मसले को तीस दिनों के भीतर निष्पादित नहीं करता, अपारदर्शिता, गड़बड़झाला और जनराशि में मची लूट पर कब तत्पर होंगे अफसरशाह.

बात सिर्फ महाबलीपुरम पंचायत की नहीं है. प्रायः सारे पंचायतों में आम सभा की सूचना अपने निजी जमूरों को दी जाती है और सारा गाँव अनजान रहता है. अपने चुनिंदे लोगों को मामूली लाभ पहुंचाकर बैठक की प्रोसीडिंग पूरी कर ली जाती है और हमाम में नंगे तमाम अधिकारियों की सहमति मिल जाती है. जनता में विगत ग्यारह वर्षों से आक्रोश व्याप्त है. कार्यान्वित योजनाओंं की जानकारी जनता को नहीं रहती और पैसों की निकासी हो जाती है. कई पुराने कार्यों की नए कार्य के रूप में मापी हो जाती है.
जनप्रतिनिधि जनता के सामने हिसाब की खुली किताब क्यों नहीं प्रस्तुत करते? जनता जब अपने प्रतिनिधियों से जनराशि का हिसाब मांगती है तो सीहीं गाँव की घटना सामने है. जनता को जाणाराशि का हिसाब उपलब्ध कराने में बीडीओ, पीओ से लेकत पंचायत सचिव और मनरेगाकर्मी तक परेशान करते है और मामला राज्य सूचना आयोग में निबटते-निबटते दो-ढाई साल बीत जाता है. तब तक रोकड़-बही दुरूस्त कर लिया जाता है, कार्य पुराना हो जाता है. यह लेट-लतीफी में सारे अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत होती है, जनप्रतिनिधि का तिकड़म होता है. यदि जनप्रतिनिधि खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक करे तो ऐसी समस्या ही पैदा नहीं होगी.
आश्चर्य है उन लोगों पर जो डीजल अनुदान, राहत राशि, आपदा कोष और फसल-क्षतिपूर्ति, कार्यालयों में न्याप्त भ्रष्टाचार और कायम अराजकता, धन-क्रय केन्द्रों पर दलालों की सक्रियता जैसे मसलों को भूल जाते है, इंदिरा आवास में गरीबों से वसूली और मनरेगा की लूट को भूल जाते है, चुनाव में नोटों और शराब के वितरण की अवैध परंपरा को विस्मृत कर देते हैं, रोजमर्रा की जिन्दगी में पुलिसिया वसूली और अवैध शराब निर्माण के प्रश्रय की प्रामाणिक खबरों को भूल जाते हैं और अगड़ो-पिछड़ों की दूकान लगाकर जनसमस्याओं से मुंह मोड़ लेते है. लुटती राशि आम जनता की है.

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