मोदी का बयान हमारी मुहिम पर मुहर: मंजूषा

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पालीगंज प्रखंड में मुखिया की सात अनारक्षित सीटें हैं और पांच सीटें अनारक्षित महिला की हैं, लेकिन पालीगंज से सामान्य जाति के महज चार उम्मीदवारों की जीत हुई है. अनारक्षित महिला वर्ग की एक भी सीट पर सामान्य वर्ग की एक भी महिला को जीत नहीं मिली है. पालीगंज के चन्ढोस पंचायत से किसी भी सामान्य श्रेणी के व्यक्ति ने नामांकन नहीं किया. सवर्णों की जनसंख्या 18 प्रतिशत है, लेकिन पालीगंज प्रखंड में उनकी जीत संख्यानुपाती नहीं है. अनुसूचित जाति के उम्मीदवार महज चार सुरक्षित सीटों पर ही फतह पा सके. उन्हें 9 सीटें चाहिए. शेष 17 सीटें पिछड़ों के खाते में गईं हैं.
दुल्हिंनबाजार मे पांच सीटें अनारक्षित और तीन सीटें अनारक्षित महिला की श्रेणी में लायीं गयीं हैं. तीन सामान्य जाति के मुखिया चुन कर आये हैं. सामान्य जाति की दो महिलाएं जीत दर्ज कर पायीं हैं. महज तीन आरक्षित सीटों पर ही दलितों को सफलता मिली है. पिछड़ों मुखियों की संख्या 6 है. परिणाम सामाजिक न्याय के नारों पर सवालिया निशान खड़ा करता है.
दरअसल यह जातीय विभाजन ही गलत है. मोदी की उक्ति गौर फरमाने भर नहीं है बल्कि उस पर अमल की जरूरत है. चुनाव तो किसी तरह जीत लिया जाता है, लेकिन देश को चलाना होता है. और वहां काबिलियत, पारदर्शिता, ईमानदारी और निष्पक्षता जरूरी है. देश, राज्य, पंचायत और गाँव बात बनाने से नहीं, सौ रूपये पर भीड़ जुटाने और पांच सौ रूपयों पर चुनावी फतह पाने से नहीं चलता. यहाँ विज़न, कांसेप्ट और खोजी मॉडल चाहिए. समर्पण और त्याग के साथ ही जोखिम का साहस नेतृत्व की क्षमता की प्रामाणिकता है. यदि चंद रूपयों पर लोकतंत्र नीलाम नहीं होता तो आज हमारी सजगता पर सवालिया निशान नहीं होते, सेक्स रैकेट चलानेवालों के शागिर्द नहीं होते, देश में पकिस्तान के झंडे नहीं फहराए जाते, राष्ट्र में भारत विरोधी नारे नहीं लगते. नेताओं में जनसेवा की भावना होती तो उन्हें जातीय दीवारों पर रोज रंगरोधन नहीं करना पड़ता, हिंसा और लूट की नीति अपनाने की बेवशी नहीं होती, बाहुबलियों और धनबलियों को महिमामंडित नहीं करना पड़ता, ईमानदारों को गोलियां नहीं खानी पड़ती. चुनाव में हमारी सजगता बरकरार होती तो हमारे समक्ष चंद रूपयों के लिए चंद दिनों की चुनावी चाकरी करने की बेवशी नहीं होती. हमें मुर्गा के दो-चार टुकड़ों के लिए प्रतिनिधियों के तलवे नहीं सहलाने पड़ते. हमारी माँ-बहु-बेटियों के साथ बलात्कार नहीं होते, सरेआम छेड़खानी नहीं होती.
जनता लोकतंत्र में मालिक की भूमिका में है. काश! हमें यह समझने की सद्बुद्धि होती. काश! हम जातीय विभाजन की लकीर को मिटाकर जनहित के मसले पर एकजूट होते. काश! हम सजग होते.

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