बिहार: लाल को लगाम की लड़ाई- *बी.बी. रंजन

                           एक ओर धृतराष्ट्र का  पुत्रमोह है,                                      दूसरी ओर मोहम्मद बिन तुग़लक का शासन है. 


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राजनीति अब सिद्धान्तों का नहीं बल्कि संभावनाओं का खेल है. नीतीश और लालू के बीच हेड और टेल का खेल जारी है. शह और मात की खेल में लालू बहरहाल आगे चल रहे हैं. मजबूरी और परिस्थतिजन्य गठबंधन में सरकार व्यक्तिगत हितों तक सिमट कर रह गई है. कहीं अपहरण, कहीं बलात्कार, कहीं खून-खराबा और कहीं फिरौती. लेकिन नीतीश को प्रधानमन्त्री बनने का नशा है, लालू को तेजस्वी का राज्यारोहन चाहिए. चारो ओर जनता की जनता कराह है, लेकिन उसे अपने कर्मों का प्रतिफल भुगतना है.


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मुस्लिम मतों पर नीतीश के बढ़ते प्रभाव से लालू चिंतित थे . एम-वाई समीकरण दरक गया था. शहाबुद्दीन का मसला लालू को एक बार फिर मुस्लिमों में स्थापित कर गया है. दूसरी ओर अनंत-शहाबुद्दीन प्रकरण में नीतीश की सवर्णों और मुस्लिम मतदाताओं से गहरी दूरी बन गई. शहाबुद्दीन के बयान से मुस्लिमों को यह सन्देश दिया गया की लालू ही मुस्लिमों के नेता हैं.


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कांग्रेस का विरोध और फिर साझा सरकार, जेल यात्रा पर राबड़ी की ताजपोशी, चारा कांड, नीतीश-लालू दरार और भाजपा के भय से गठबंधन, राजद काल में चरमरायी कानून-व्यवस्था और बदहाल लोग, जातीय विद्वेष की राजनीति, जाति-आधारित नरसंहारों की फेहरिस्त, भाजपा के साथ कभी गठबंधन और फिर साम्प्रदायिकता का विलाप, झारखंड निर्माण के खिलाफ एलान और फिर सत्ता के लिए झारखंड विभाजन, अल्पसंख्यकों के प्रति तुष्टिकरण की नीति, वीपी सिंह के प्रति भक्ति और फिर मंडल मसला को हड़पने की बेचैनी जैसे ऐसे कई मसलों पर लालू का सामाजिक न्याय चरमराता दिखा है. दलित हत्या के लिए बदनाम लालू राज में पिछड़ों और दलितों के मतों की गोलबंदी के बातूनी प्रयासों को हटा दें तो लालू ने ऐसा कोई निर्णय नहीं किया है जिससे दलित-पिछड़ें तरक्की कर पाए. उनका राजनीतिक जीवन वंशवादी राजनीति को समर्पित दिखता है जहाँ वास्तविक गरीबों को जगह नहीं मिलती. उनके दल में पूंजीपति पिछड़े और दलित नेताओं की पैठ है. यहाँ एक ओर धृतराष्ट्र का  पुत्रमोह है, दूसरी ओर रोज बदलते निर्णय वाले मोहम्मद बिन तुग़लक का शासन है.


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लालू प्रसाद का सामाजिक न्याय का नारा मंचों पर दमदार तो दिखता है, लेकिन हर बार उनका निशाना सत्ता पर कब्ज़ा को लेकर स्थिर हो जाता है. राजनीति को जनसेवा के रूप में नहीं लिया जाता, बल्कि इसे पेशा बना लिया गया है. पहली बार लालू की ताजपोशी हुई और जब चारा कांड में लालू को जेल जाना पड़ा तो राबड़ी  देवी से योग्य और भरोसेमंद उन्हें कोई नहीं दिखा. आज राजनीति में हाशिये पर चल रहे श्याम रजक उन दिनों राबड़ी की ताजपोशी का प्रस्ताव रखते थे. ‘हमारी लाश पर झारखंड का निर्माण’ का दम ठोकनेवाले लालू ने कमजोर पड़ती सरकार की स्थिरता के लिए झारखंड को विभाजित करने में एक पल की देर नहीं की. कांग्रेस विरोधी राजनीति और जेपी आन्दोलन से सुर्ख़ियों में आये लालू प्रसाद ने पहले कांग्रेस को अपदस्त किया और फिर अल्पमत सरकार के लिए कांग्रेस के साथ साझा सरकार चलाने में देर नहीं की.

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सामाजिक न्याय का दम भरनेवाले लालू ने राज्य में जमकर जातीय लहर बहायी और जाति एवं परिवार आधारित राजनीती के सिवा उनका कोई सिद्धान्त नहीं रहा. अवसर की पहचान करनेवाले लालू ने हमेशा अपने राजनैतिक कद के प्रति सतर्कता बरती और किसी भी दल से साझा करने और पला भर में उसे दरकिनार करने में देर नहीं की. किसी भी मुद्दे को लपकने में उनहोंने हमेशा चतुराई का परिचय दिया और दूसरों के कांसेप्ट को छिनने में तत्परता दिखलाई. भाजपा के कंधा पर चलकर  सत्ता पानेवाले लालू ने आरक्षण का मसला आते ही उसे साम्प्रदायिकता के नाम पर ढकेल दिया.

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नीतीश से दोस्ती और फिर राजनैतिक दुश्मनी के बाद राजनैतिक रूप से हाशिये पर गए लालू ने अपनाने में देर नहीं की. नरेन्द्र मोदी के बढ़ते प्रभाव से घबराए लालू ने पहले भारी मन से नीतीश को नेता मान लिया और फिर तेजस्वी के लिए आगे का दरवाजा खोलने की कोशिश प्रारंभ की. तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री बनने में सफलता पाने के बाद लालू नीतीश के सुशासन बाबू की छवि से घबरा गए थे और तेजस्वी के कद में विस्तार के लिए नीतीश के कद को बौना करना जरूरी था. लालू ने सत्ता पाने के बाद इस मिशन पर काम किया. उन्हें नीतीश के सिपहसालारों को बाहत का रास्ता दिखने के लिए नीतीश को मजबूर किया. जब कभी नीतीश लालू की बातों से ज्यादा असहमत हुए तो लालू सीधे मीडिया में चले गए और नीतीश सकते में आ गए. नीतीश के बाहुबलियों और थिंक टैंकों को किनारा कराने में लालू ने भरपूर मिहनत की.

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सुशासन की छवि को अपराध के बढ़ाते ग्राफ से धक्का लगा और रघुवंश सिंह जैसे कुछ लोगों से बयान उगलावाकर लालू ने नीतीश पर कटाक्ष का दौर जारी रखा. लालू ने शासन पर अपनी नकेल राखी और नीतीश को कभी कार्य करने के लिए खुली छुट नहीं दी. आज शहाबुद्दीन के मसले पर नीतीश को कटघरे में खड़ा किया और अनंत पर सीसीए लगाने को मजबूर कर नीतीश को सवर्ण मतों की ओर लौटने का मार्ग बंद कर दिया. स्वाभाविक है भाजपा आज की तारिख में सवर्ण मतों पर अच्छी पकड़ रखती है और अनंत-शहाबुद्दीन प्रकरण में उबलना भाजपा की मजबूरी भी है और राजनैतिक अवसरवादिता भी. ऐसी स्थिति पैदा कर नीतीश को लालू ने हर मोर्चे पर असहज कर दिया है. उनकी भाजपा की ओर मुखातिब होने की संभावना पर भी बहरहाल पानी फेर दिया है. ऐसे राजनीति अब सिद्धान्तों का नहीं बल्कि संभावनाओं का खेल है. 

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राजनीति के माहिर खिलाड़ी लालू नीतीश के हाथों नेतृत्व सौपकर इसका भरपूर लाभ लेना जानते थे. उन्हें पता था की उनके दबाव में भी लिए गए हर निर्णय की जिम्मेदारी नीतीश पर जायेगी. अपने स्वजातीय मतों की गोलबंदी और सामाजिक न्याय के मसलों की छिनाझपटी में लालू निपुण रहे हैं. ऐसे सभी मसलों को लालू झपटने में सफल रहे. बाढ़ और आरक्षण के मसलों को लालू ने अपने बूते कर लिया और अनंत पर कार्रवाई का विरोध नीतीश झेलते रहे. तेजस्वी उप मुख्यमंत्री हैं, लेकिन अपराध की बढ़ती घटनाओं के लिए रघुवंश के बयान के अनुसार नीतीश दोषी करार दिए गए. सरकारी कार्यों में पिता-पुत्र का हस्तक्षेप बरक़रार रहा और नीतीश बिहार चलाने में असहज दिखे. नीतीश की सत्तालोलुपता और अवसरवादिता ने नीतीश की राजनीतिक विरासत को कमजोर कर दिया. बहुत अधिक तेज चलने का वहम और अति महत्वाकांक्षा नीतीश के राजनैतिक पराभव के कारण बन गए हैं.

मुस्लिम मतों पर नीतीश के बढ़ते प्रभाव से लालू चिंतित थे . एम-वाई समीकरण दरक गया था. शहाबुद्दीन का मसला लालू को एक बार फिर मुस्लिमों में स्थापित कर गया है. दूसरी ओर अनंत-शहाबुद्दीन प्रकरण में नीतीश की सवर्णों और मुस्लिम मतदाताओं से गहरी दूरी बन गई. शहाबुद्दीन के बयान से मुस्लिमों को यह सन्देश दिया गया की लालू ही मुस्लिमों के नेता हैं. साहेब के बयान से नीतीश की राजनैतिक  हैसियत भी बताने की कोशिश की गई. बीस सीटों तक ही सिमटने का बयान सांकेतिक बयान था. एक अपराधी की जगह-जगह ताजपोशी और टोल टैक्स का मामला जदयू की गले की हड्डी बन गया और यादव-मुस्लिम मतदाता एकजूट दिखे. बची-खुची कसर रघुवंश के बयानों और लालू की सहमति ने पूरी कर दी.

यह तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम का सक्रिय दौर है. सजायाफ्ता लालू की सत्ता पर वंशवादी स्थायित्व की यह मुहिम न तो सामाजिक न्याय का हिस्सा है और न ही गरीबों और पिछडो-दलितों की तरक्की से प्रेरित है. यह धृतराष्ट्र के पुत्रमोह की पराकाष्ठा है. इस मिशन में शत-प्रतिशत सत्ता पर वंशवादी कब्ज़ा की हवश है. गरीबों के उद्धार की उल-जुलूल बातें, पिछड़ों और दलितों को न्याय दिलाने के सारे दावे और आरक्षण की अनर्गल बयानबाजी बेटे और बेटियों को राजनीतिक कैरियर देने की भावना से प्रेरित है. यह एक आधुनिक धृतराष्ट्र का दुर्योधन के प्रति पुत्रमोह है, जहाँ न्याय की सारी बातें बेमानी हैं. नीतीश और लालू के बीच हेड और टेल का खेल जारी है. दोनों अपने राजनैतिक कद में विस्तार की नीति चला रहे हैं. शह और मात की खेल में लालू बहरहाल आगे चल रहे हैं. मजबूरी और परिस्थतिजन्य गठबंधन में सरकार व्यक्तिगत हितों तक सिमट कर रह गई है. कहीं अपहरण, कहीं बलात्कार, कहीं खून-खराबा और कहीं फिरौती. लेकिन नीतीश को प्रधानमन्त्री बनने का नशा है, लालू को तेजस्वी का राज्यारोहन चाहिए. विधानसभा के आगे शहीदों की प्रतिमा है. सदन के अन्दर और बाहर माननीयों का नंगा नाच है. जनता आज मूकदर्शक है. चारो ओर जनता की जनता कराह है, लेकिन उसे अपने कर्मों का प्रतिफल भुगतना है. भुगतना भी चाहिए.



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