सीनियर सिटीजन डे एक सांकेतिक शिक्षा: मंजूषा रंजन

जिसने हमें चलना सिखाया, वही दुनियाँ का सबसे बड़ा देवता है. घर के देव को छोड़कर वैष्णोदेवी के चक्कर की क्या जरूरत? ‘मोको कहाँ टू ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में’.


हमें एकाकी जीवन को हरा-बार बाग़ बनाये रखने की शिक्षा दे गए फिल्म बागवान और सीनियर सिटीजन डे. हम यथार्थ का बोध करा गयी फिल्म ‘ओ माय गॉड’.  हम रामचरितमानस का पाठ तो कभी-कभी कर लेते हैं, लेकिन उसके मर्म को समझने की जहमत नहीं उठाते. मिथक टूटने के बजाये सकारात्मक परम्पराएँ टूटतीं जा रहीं हैं.


बैंकों की शाखाओं में बुजुर्गों का सम्मान एक रूटीन वर्क नहीं बल्कि एक दूरगामी संकेत दे गया. उदंडता की ओर प्रवृत समाज को सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा की नसीहत दे गया 19 नवम्बर.


एकाकी जीवन हताशा पैदा करता है और यह असमय विदाई का महत्वपूर्ण कारण है. हमारे देश में व्यर्थ में व्यस्त बनाने का शौक है. भारत के प्रायः हर व्यक्ति के पास खाली समय है, लेकिन सामान्य से ख़ास बनाने का शौक हमारी सभ्यता, संस्कृति और अच्छी परम्पराओं का दुश्मन है. कल तुम भी अशक्त होनेवाले हो, बुढ्ढे होनेवाले हो, तुम्हारी कमान भी जानेवाले है. हर विशिष्ठ दिन से कुछ सीखने की जरूरत है


कल बैंक की शाखाओं में सीनियर सिटीज़न का ख्याल रखा गया. समझदार और संवेदनशील लोगों के लिए यह एक सांकेतिक दिन था. घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में बड़े-बुजुर्गों को दरकिनार करने से उनके अन्दर एक उपेक्षा और अकेलापन की भावना पनपती है, जिसकी निरंतरता जीवन को बोझिल बना जाती है. जिन्दा व्यक्ति को कार्यकलापो में हिस्सेदारी चाहिए. ‘बुढापा एक अभिशाप है’ की सोच को बदलने के लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी. स्वीकार करना होगा कि कल हमारी बारी है. जिसने हमें चलना सिखाया, वही दुनियाँ का सबसे बड़ा देवता है. घर के देव को छोड़कर वैष्णोदेवी के चक्कर की क्या जरूरत? ‘मोको कहाँ टू ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में’.

दरअसल हम भाग-दौड़ की जिन्दगी में हम अपने संस्कारों को भूलने लगे हैं. कम समय में ज्यादा पाने की चाह में हम अपनी जिम्मेदारियों से मुकरने लगे हैं. सोशल मीडिया से हमारी नजदीकी हमें अपनों से दूर करने लगी है. हमारा बेकार का शौक हमें जरूरी बातों से दूर करने लगा है. हम अपनो से दूर होते जा रहे है. मिथक टूटने के बजाये सकारात्मक परम्पराएँ टूटतीं जा रहीं हैं.

हमें घर की जरूरी बातों पर बुजुर्गों से सलाह लेनी चाहिए. उन्हें महत्वपूर्ण बातों से अवगत कराना चाहिए. उन्हें घर के व्यक्ति होने का एहसास होना चाहिए और इसके लिए यथासंभव जरूरी बातों में उनकी सहभागिता या उपस्थिति जरूरी है. एकाकी जीवन हताशा पैदा करता है और यह असमय विदाई का महत्वपूर्ण कारण है. सबसे जरूरी है की हम उन्हें परिवार के बीच में रखें और घर के सारे लोग एक जगह इकठ्ठा होकर कुछ खाली समय एक साथ व्यतीत करें. हमारे देश में व्यर्थ में व्यस्त बनाने का शौक है. भारत के प्रायः हर व्यक्ति के पास खाली समय है, लेकिन सामान्य से ख़ास बनाने का शौक हमारी सभ्यता, संस्कृति और अच्छी परम्पराओं का दुश्मन है.

गाड़ियों पर बैठने के बाद लोग मोबाइल पर व्यर्थ में व्यस्त होने की भौंडी नक़ल करते हैं. गाड़ी से नीचे के बोल और गाड़ी पर बैठने के बाद के बोल बदल जाते हैं. गाडी से नीचे सौम्यता और शालीनता का पुट तो मिलता है, लेकिन गाड़ी पर विराजमान होते ही शान भरे अंदाज़ से सामना हो जाता है. हुजूर! गाडी आपकी है तो सुख-सुविधा भी आप लेते हो. आपका एहसानमंद दूसरा क्यों? व्यर्थ की शान से बेहतर है की बुजुर्गों का सम्मान करने की भारतीय परंपरा का पालन करो. कल तुम भी अशक्त होनेवाले हो, बुढ्ढे होनेवाले हो, तुम्हारी कमान भी जानेवाले है. हर विशिष्ठ दिन से कुछ सीखने की जरूरत है, लेकिन समाज में अजीब विडम्बना है. शादी के अवसर को हम जिम्मेदारी भरी जिन्दगी की शुरूआत की जगह ऐश भरी जिन्दगी का आगाज मान लेते हैं और यहीं हमारे दुखों की शुरूआत हो जाती है. अपने पूर्वजों की जन्दगी से हम इतना भी नहीं सीख पाते.

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