जिंदा लाशों को स्वतंत्रता दिवस की कैसी शुभकामना : बी.बी.रंजन 

लोकतंत्र जिन्दा लाशों के हाथों गिरवी हो चला है

बिल्ली की पंचायती बंदरों को मिल गई है. 

आज़ादी और लोकतंत्र के रक्षक जूनून शुभकामना के हकदार 

 

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शुभकामना संदेशों की ढेर देखता हूँ तो इसका अर्थ सड़कों पर, कार्यालयों में, जनसेवकों की राजनैतिक दूकानों और  गाँव के गलियारों में खोजता हूँ. आज़ादी का अर्थ आज़ादी के कुछेक दिनों की रचनाओं को देखकर समझ में आती है, लेकिन उतरोत्तर इसका पड़ता अर्थ दिखता है. मुझे लगता है कि आज़ादी तो मिली है, लेकिन अनगिनत नकारात्मक क्षेत्रों में. आज सड़क पर चलती महिलाओं को छेड़ने की आजादी है. सड़कों पर बारात ठहराने की आज़ादी है. डॉक्टरों को अस्पताल से पलायन की आजादी है. शिक्षकों को गायब रहने की आज़ादी है. बाहुबलियों को जनसेवक बनने की आजादी है. धनबलियों को सत्तासीन होने की आज़ादी है. जनप्रतिनिधियों को लूट की छूट है. अधिकारियों को भ्रष्टाचार में लिप्त रहने की आज़ादी है. पुलिस को अपारदर्शी और लेट-लतीफ़ कार्रवाई की आज़ादी है. प्रशासन को शिथिलता बरतने की स्वतंत्रता है. मतों के बिकाऊ ठेकदार तो जिन्दा लाश हैं, लेकिन उन्हें अनैतिक लोगों को विजयी बनाने की आज़ादी है. इंसानियत को शर्मशार करने की आज़ादी है. भ्रष्टाचारियों के महिमामंडित करने की आज़ादी है. सजायाफ्ता को सत्ता सौपनें की आज़ादी है. दलित प्रेम के नाम पर जातीय तनाव कायम कर चुनाव जितने आजादी है. अल्पसंख्यक के हितों के नाम पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की आज़ादी है. सत्ता के लिए आतंकवादी गतिविधियों पर चुप्पी साधने की आज़ादी है. 

सड़कों पर सुरक्षित चलने की आज़ादी, जनसेवक को सत्ता सौपने की आज़ादी, अपने कार्यों को त्वरित निष्पादन की आज़ादी, सरकारी सुविधा का लाभ उठाने की आज़ादी, जनप्रतिनिधियों तक अपनी बात पहुंचाने की आज़ादी और पुलिस के समक्ष अपराध की सूचना पहुंचाने की आज़ादी अभी तक नहीं मिली है. 

लोकतंत्र  विवेकशील और दूरदर्शी नेक दिल इंसान के हाथों से निकल कर जिंदा लाशों के हाथों चली गई है. चंद रूपये पर लोकतंत्र को नीलाम कर फिर अगले पांच वर्षों की चक्की में पीसनेवाले लोग जिंदा लाश ही है. जिन्हें लोकतंत्र का ज्ञान नहीं, जिन्हें विकास और पारदर्शिता की समझ नहीं, जिनके पास उचित-अनुचित पर निर्णय करने की क्षमता नहीं, वैसे लोग आज राजनीति में सक्रिय हो गए हैं. जिन्हें एक लाइन बोलना नहीं आता वे लोग आज लोकतंत्र का नया परिभाषा गढ़ने लगे हैं. जिन्हें जनसेवा का अर्थ नहीं पता वैसे लोग आज राजनीति की दिशा निर्धारित करने लगे हैं. जिन्हें लूटने से वक्त नहीं मिलता वैसे लोगों को आज विकास की जिम्मेदारी मिल गई है. भ्रष्ट लोकसेवकों के साथ बैठकी और हिस्सेदारी करनेवाले लोग विकास-निधि के रक्षक बने बैठे हैं. आपसी भाईचारा को नष्ट करनेवाले लोग पंच की भूमिका में आ गए हैं. अपारदर्शी लोग विवादों को सुलझाने की ठेकेदारी लेने लगे है. बिल्ली की पंचायती बंदरों को मिल गई है.

लफंगों ने राजनीति को स्वरूप देना प्रारंभ का दिया है. चंडाल चौकड़ी और चिल्लर पार्टियों के लोग जीत और हार का सर्टिफिकेट बांटने लगे हैं. निजी स्कूलों और लुटेरे नर्सिंग होमों का शुल्क ऐडा करने में बेवश चरित्र चुनाव में धनाबलियों की प्राथमिकता स्थापित करने को आमादा दिखता है. बेटी की शादी में जमीन गिरवी रखने को विवश इंसान चुनाव में चंद टुकड़ों पर लोकतंत्र को नीलाम करने की सिफारिश करता है. थाने में एफ आइ आर लॉज करने के लिए रिश्वत देने को मजबूर शख्स चुनाव में भ्रष्टाचारी प्रत्याशी का प्रचारक बनता है. पैसे के अभाव में बच्चों की पदाई बाधित होने के बाद बच्चों को पुलिस में भर्ती के लिए जमीन बेचकर रिश्वत की पेशकश करनेवाला व्यक्ति धनबलियों के पक्ष में मुहिम चलाता है. अधिकारियों की शिथिलता का मारा बेवश इंसान कार्यालयों का महीनों चक्कर  लगाता है, लेकिन  पांच सौ रूपये पर मतों को बेचता है. गाँवों की गलियों के चंद दिनों के बाद ही तुतानेवाले खरंजा पर उसके नौनिहालों के नाख़ून उखड़ते हैं, लेकिन चुनावी बयार में वही शख्स सिर्फ पैसों की बात बोलता है. एक शाम की मुर्गा पार्टी पर लोकतंत्र नीलाम होता है. एक बोतल शराब पर देश की आजादी बिक जाती  है. एक सौ रूपये दैनिक पर समर्थकों की जमात बनती है. पचास रूपये पर प्रचारकों की फ़ौज चलती है. धोती-कुर्ता और गमछा की भेंट पर स्टार प्रचारक की भूमिका निभायी जाती है.

जनसरोकार से जुड़े बंद स्वास्थ्य केन्द्रों के मसले नहीं उठते, सरकार के करोड़ों उठ जाते हैं. हम लुटेरे निजी अस्पतालों में जाने को विवश हैं. अनियमित शिक्षालयों की बुनियाद पर चल रहे महंगे निजी शिक्षण  संस्थानों पर सवाल नहीं उठाते, लेकिन शिक्षकों के वेतन मद में करोड़ों का वारा-न्यारा हो जाता है. पशुओं की चिकित्सा के लिए पंजिओं पर सरकार की ओर से तमाम सुविधाओं उपलब्ध हैं, लेकिन मतों के ठेकदारों का ध्यान इस ओर जाता. दरअसल इब ठेकदारों की फ़ीस हनुमान मंदिर के गेट पर बैठे उन भिक्षुओं से भी कम है. इनका ईमान और स्तर उन भिक्षुओं के सामान नहीं जो सबों के सामने पारदर्शी तरीके से भिक्षा लेते है. मतों के ठेकदारों का भिक्षाटन गुपचुप तरीके से होता है. जिसे व्यवस्था के कारण बच्चों नी शिक्षा की बदती फ़ीस, नौकरियों में पैसों का लेनदेन, निजी अस्पतालों की महंगी चिकित्सा व्यवस्था, कार्यालयों में रिश्वतखोरी का बदता ग्राफ, विकास निधि में उतरोत्तर बदता कमीशन और पुलिसिया दमन का ज्ञान नहीं, वैसे लोग ही आज लोकतंत्र के ठेकेदार बन बैठे हैं. जिन्हें लाखों न्योछावर कर सैकड़ों बटोरने की बेचैनी है उन्हें हम निश्चित रूप से जिंदा लाश कहेंगे. 

हम देश में शिथिल पड़ते उन जागरूक लोगों से एक बार फिर आगे आने की गुहार लगाते हैं. आप अकेले नहीं हैं. देश की सजग पीढ़ी आपके नेतृत्व की प्रतीक्षा कर रही है. आज आठ सौ लोग हैं, कल आठ गजार होंगे, और परसों आठ करोड़. फिर जिंदा लाशों में भी गति आएगी, उनके अन्दर का मरा हर स्वाभिमान जागेगा, क्रांति का जनक एक होता है, विचारधारा का प्रवर्तक एक होता है, फिर लोग आते जाते हैं, कारवां बनता जाता है. चिराग अँधेरे से नहीं बुझता. चाहे उसे हवा का झोका लग जाए, चाहे उसे पानी का सामना करना पड़ जाये. लेकिन कोई भी रोशनी की तिल्ली अंधेरों से नहीं भुझाती. और फिर मानव पराक्रम ने पानी और आंधी में भी नहीं बुझनेवाले इन्वर्टर और इन्डेन का इजाद कर लिया. बस जरूरत हाथ पर हाथ रखकर बैठने की नहीं है, पगडंडियों के पथिक से घबराने की नहीं है. 

………………. और जिंदा लाशों की दादागिरी, लोकतंत्र की नीलामी और देश के साथ गद्दारी के दौर में हम किस बात की शुभकामना दें? मैं शुभकामना देता हूँ उन्हें जो कायरता के खिलाफ बिगुल बजाने की तैयारी में है. मेरी शुभकामना उनके लिए है जो वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना के लिए क्रांति लाने की तैयारी में हैं. मै उन्हें शुभकामना देना चाहता हूँ जो आज़ादी को सच्चे अर्थों में स्थापित करना चाहते हैं. ऐसे पवित्र जूनून को मेरी हार्दिक शुभकामनाये!

 

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