राजनीति: कभी पास, कभी दूर.

35 वर्षों की गुलामी से आज़ादी चाहता है पालीगंज: मंजूषा रंजन की रपट 

मंजूषा रंजन: पालीगंज के राजनीतिक बदलाव पर पैनी नजर.


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रामकृपाल: कभी लालू के पास, आज काफी दूर. पुत्र के जनसंपर्क अभियान पर चर्चा का दौर.

आगामी चुनाव में पालीगंज विधानसभा क्षेत्र से रामकृपाल के पुत्र को उतारे जाने की चर्चा है. वंशवादी राजनीति में रामकृपाल के प्रवेश की संभावना बनती जा रही है. पैतीस वर्षों से पालीगंज में बाहरी प्रत्याशियों को भाजपा ने उतारा  है. पालीगंज के लोग 35 वर्षों के वनवास से मुक्ति चाहते हैं.

रामजनम: बिक्रम के बाद पालीगंज से भी करारी शिकस्त, लेकिन अच्छी व्यापारिक पकड़.

इस बार स्थानीय प्रत्याशी के उतारे जाने मांग जोड़ पकड़ेगी. स्थानीय के नाम पर चेहरा देखकर विरोध करने और अपने सम्बन्धियों का समर्थन करनेवाले  लोगों के खिलाफ भी आवाज़ मुखर होने लगी है. दोहरे चरित्रवाले और दलबदलू नपेंगे. पालीगंज के स्थानीय लोगों का कहना है की इस बार प्रारंभ से ही स्थानीय ईमानदार व्यक्ति को प्रत्याशी बनाने की मांग होगी. जनार्दन शर्मा और उषा विद्यार्थी भी पालीगंज से बाहर के हैं और जनता उनके कार्यकलाप से नाराज रही है. बिक्रम से एक बार जीत हासिल कर लगातार हारनेवाले रामजनम शर्मा भी पालीगंज से नाकाम रहे हैं और क्षेत्र के लोग उन्हें पसंद नहीं करते. बिक्रम विधानसभा क्षेत्र में जनाधार गँवा चुके रामजनम ने पालीगंज से राजनीति में पुर्नवापसी की कोशिश की थी, लेकिन बुरी तरफ पराजित हो गए. पालीगंज के लोग बाहरी प्रत्याशियों की उपेक्षा के शिकार रहे हैं. 

राजनीति में कभी रामानंद यादव के करीबी रहे रामकृपाल यादव आज भाजपा का यादव चेहरा बन बैठे हैं. भाजपा रामकृपाल यादव और भूपेंद्र यादव को यादव चेहरा के रूप में पेश करने लगी है. वर्षों से भाजपा का दामन थामनेवाले नन्दकिशोरे यादव आज इस रेस में पीछे चल रहे हैं.

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उषा विद्यार्थी: राजशाही जिन्दगी का आरोप, मुलाक़ात में इंतज़ार से परेशान लोग.

जातीय राजनीति से आनेवाले रामकृपाल यादव कभी लालू प्रसाद की छत्रछाया में थे और उन्हें लालू प्रसाद का हनुमान कहा जाता था. रामकृपाल मीसा भारती को टिकट देने से बिफर गए थे. इनका मोबाइल अचानक बंद हो गया था और मीडिया के गिने-चुने लोगों से इन्होंने फोने पर बात की थी. मुझसे भी इनकी बात हुई थी और तब इन्होंने भाजपा की आइडियोलॉजी से भिन्नता दर्शाई थी, लेकिन चार दिनों के अन्दर इन्होंने भाजपा की सदस्यता ले ली थी और पाटलिपुत्र से बाबा रामदेव के चहेते नवल किशोर यादव का पत्ता साफ़ कर दिया था. 

जनार्दन शर्मा: कभी पालीगंज के चहेते, आज हासिये पर. अति महत्वाकांक्षा का मारा, बेचारा.

कभी भाजपा की आइडियोलॉजी का विरोध करनेवाले रामकृपाल यादव आज भाजपा के अघोषित प्रवक्ता हैं. पाटलिपुत्र से टिकट की दावेदारी निरस्त होने के बाद रामकृपाल भाजपा की और मुखातिब हुए थे और चंद दिनों में ही भाजपा के कद्दावर नेता के रूप में उभर गए. विधानसभा के टिकट के बंटवारे में रामकृपाल की खूब चलती थी. सूत्रों के अनुसार पालीगंज से उषा विद्यार्थी का पत्ता साफ़ कराने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. रामकृपाल और नंदकिशोर यादव पालीगंज से जयवर्धन यादव की दावेदारी चाहते थे, लेकिन राजद से टिकट पक्की होने के बाद जयवर्धन ने सेफ रास्ता लिया और भाजपा के ऑफर को ठुकरा दिया था. फिर टिकट के लिए नन्दकिशोर यादव के एक नजदीकी रिश्तेदार का नाम आया था, लेकिन रविशंकर प्रसाद और सुशील मोदी की पहल पर रामजनम शर्मा को प्रत्याशी बनाया गया. चुनाव में रामजनम के ऊपर जयवर्धन को बड़ी बढ़त मिली थी. रामजनम समर्थक चुनाव में भीतरघात की भी बात करते हैं. उषा समर्थकों के विरोधी स्वर का कोई असर तो नहीं था, लेकिन रामजनम समर्थक पालीगंज से भाजपा की हार को विश्वासघात का प्रतिफल मानते हैं. पालीगंज से भाजपा की हार में चुनावी कुप्रबंधन और प्रत्याशी का ढीला-ढाला रवैया सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण था.

पालीगंज की राजनीति में बाहरी प्रत्याशी उतारने की वर्षों से चली आ रही परिपाटी से भी पालीगंज की  सीट प्रभावित हुई थी. रामकृपाल यादव के करीबी सूत्रों की मानें तो आगामी विधानसभा चुनाव में मंत्रीजी अपने पुत्र को प्रत्याशी बनाने की कवायद करेगें. क्षेत्र में आयोजित कार्यक्रमों में मंत्रीपुत्र की उपस्थिति देखी जा रही है. पैपुरा मंदिर के पूजा कार्यक्रम में भी मंत्रीपुत्र की उपस्थिति देखी गई थी और उसके बाद यह सामान्य बात हो गई है. क्षेत्र में जनसंपर्क बढ़ाने की कवायद से लोगों का अनुमान है कि सन 2020 के विधानसभा चुनाव में रामजनम शर्मा और उषा विद्यार्थी सरीखे नेताओं को बाहरी के नाम पर जबर्दस्त विरोध का सामना तो करना ही पड़ेगा, रामकृपाल यादव को भी पुत्रमोह से भी निबटना होगा. कई नए चहरे भी प्रयास करेंगे, लेकिन स्थानीय प्रत्याशी का मुद्दा उछलेगा और मंत्रीपुत्र भी गोरियाटोली के रहनेवाले हैं.

ऐसे भी पालीगंज में यादव बनाम सवर्ण प्रत्याशी के बीच टक्कर रहता है और रामकृपाल यादव के पुत्र को यादव मतदाता किसी भी हालत में लालू यादव के प्रत्याशी के सामने तरजीह नहीं देंगे. पालीगंज में यादव मतदाताओं का रूझान राजद के प्रत्याशी के पक्ष में होगा. संसदीय चुनाव में भी रामकृपाल यादव, यादव मत का दो प्रतिशत हिस्सा भी झटकने में कामयाब नहीं रहे थे, लेकिन यादव चेहरा के नाम पर नंदकिशोर-रामकृपाल की भाजप के अन्दर अच्छी चलती है.

बहरहाल, पालीगंज के लोग पालीगंज को ३५ वर्षों की गुलामी से आजादी के लिए आन्दोलन चलाना चाहते हैं. उपेक्षित पालीगंज तानाशाह प्रत्याशियों से निजात दिलाकर एक पारदर्शी, चरित्रवान और समर्थ क्षेत्रीय राजनेता की ताजपोशी का मन बना चुका है, ताकि उनके सपनें के पालीगंज का निर्माण हो सके.

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