अपनी तकदीर संभालने में असफल जिन्दा लाशों को कैसी शुभकामना?

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मोहम्मद बिन तुगलक की तरह पुराने निर्णयों को बदल कर नए कानून और फिर पुनर्वापसी …. अनिर्णय की स्थिति क्यों हैं?

जब जनता मूर्ख लोगों को शक्ति या अधिकार सौपती है तो ताकत के दुरूपयोग की लम्बी फेहरिस्त बनती है. यह जनसमूह के लिए हानिकारक होती है. समझदार और सुलझे हुए लोगों को मिलनेवाली शक्ति से सामूहिक विकास होता है. योग्य लोगों के प्रतिनिधित्व में विकास कार्यों में जनता की भागीदारी बढ़ती है और पारदर्शिता, साख एवं निष्पक्षता पर बल रहता है. किसी भी विभाग, संगठन, संस्था और शासन के सर्वोच्च पद पर बैठे अपरिपक्व और अदूरदर्शी व्यक्ति से पद का दुरूपयोग प्रारंभ होता है. उच्च पद अधिकार सम्पन्न होते हैं और अविवेकी व्यक्ति असीमित अधिकारों से खेलना पसंद करता है. जनहित की भावना को तिलांजलि देकर ऐसे लोग मुठ्ठी भर लोगों के विषय में सोचते हैं और वही लोकतंत्र ख़त्म हो जाता है. दूसरी ओर एक विवेकी व्यक्ति अधिकार मिलने के बाद जिम्मेदारियों से दब जाता है. लोकतंत्र के मालिक को बेवश, निर्बल और निर्धन बना दिया गया है.

 सदा अलग अंदाज में ही रहे लालू प्रसाद यादव

अनायास सम्पति यदि मूर्खों के पास आ जाती है तो अपराध बढ़ जाता है. मंहगी गाड़ियों से चलनेवाले नासमझ लोग राहगीरों की जान की कीमत नहीं समझते. लोगों की सुरक्षा की बजाये उन्हें निर्दोषों के शरीर पर गाड़ियाँ चढ़ाने में अपनी शान में इजाफा दिखता है. वही पैसा जब समझवाले लोगों के पास आता है तो सकारात्मक उद्योगों की स्थापना कर लोगों को रोजगार उपलब्ध करा दिया जाता है.

सजग और जिम्मेदार थानेदार को देखकर क्षेत्र की जनता सुरक्षित महसूस करती है, लेकिन भ्रष्ट थानेदार को देखते ही सज्जन लोग सहम जाते हैं. पद एक है, लेकिन पदधारक के चाल, चरित्र और चेहरा से उसकी चमक और सनक बदल जाती है. पारदर्शी प्रतिनिधियों के पास सभी लोगों की समस्याओं का निराकरण होता है, लेकिन जातिवादी और संकुचित नेताओं के पास सिर्फ स्वजातीय मंडली की कुण्डली लिखी जाती है. शालीन जनसेवक जनता के लिए हर समय उपलब्ध रहता है, लेकिन दम्भियों के पास मिलने को प्रतीक्षा करनी पड़ती है, समस्याओं के निराकरण के लिए दलालों से जुगत बैठाने पड़ते है. योग्य और ताकतवर जनप्रतिनिधियों का अधिकारियों के नाम एक कॉल काफी होता है, लेकिन दलाल प्रतिनिधियों को अधिकारियों के समक्ष दरबार लगानी पड़ती है. कई दफा तुच्छ लोगों को अधिकारियों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट तक के उदहारण आते हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कमजोर प्रतिनिधियों के गैरलोकतांत्रिक पहल की सराहना नहीं की जा सकती. मैं अनियंत्रित लोगों की कलई का उदभेदन कर उनके अन्दर भी नैतिकता के समक्ष समर्पण का उत्साह पैदा करना चाहूँगा. 

ईश्वरीय शारीरिक सुन्दरता अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करती है, लेकिन यदि सुन्दरता नासमझ लोगों को मिल जाती है तो समाज में बदचलनी के उदाहरण दिख जाते हैं. प्रतिष्ठित लोग कपड़ों से अपना तन ढंकते हैं, लेकिन शारीरिक सौष्ठव का भौंडी प्रदर्शन करनेवाले लोग अपनी अर्धनग्न तस्वीरों को फेसबुक पर पोस्ट कर गर्व महसूस करते हैं. फेसबुक अपनी सकारात्मक विचारों को जनमानस तक निःशुल्क पहुंचाने का माध्यम है, लेकिन आज बेकार लोगों के लिए यह मंत्रियों और विधायकों के साथ तस्वीर पोस्ट करने का माध्यम बन गया है, आज फेसबुक अश्लील प्रेम संवादों का संवदिया बन गया है. फेसबुक पर शान-शौकत भरी जिन्दगी की तस्वीरें पोस्ट कर गरीबों को ललचाया जा रहा है, सार्वजनिक राशि के दुरूपयोग से अर्जित समृद्धि का बेशर्मी के साथ इजहार कर उपेक्षित जनता को जलाया जा रहा है. गरीब जनता को निरीह बना दिया गया है और अपनी सम्पन्नता प्रदर्शित करनेवाले तस्वीरों को पोस्ट कर उनकी दुर्दशा पर नमक छिड़का जा रहा है.

समझदार लोगों के लिए मातमपुर्सी गम की स्थिति में एक सवेदनशील मानवता है. आज हमारे बीच के कुछ गैरजिम्मेदार जनप्रतिनिधि भेड़हरिया इंग्लिश गाँव के मृतक की मातमपुर्सी को फोटोग्राफी का सुअवसर मान लेते हैं और इन तस्वीरों को फेसबुक पर पोस्ट का राजनीतिक माइलेज लेने की कोशिश तक करते हैं. फेसबुक टटोलें और असंवेदनशील हरकत की प्रामाणिकता से रूबरू हो लें. मैंने भी प्रमाण के तौर पर प्रति सुरक्षित कर ली है, क्योंकि फेसबुक में डिलीट का आप्शन भी है.

स्वार्थी और अनैतिक चरित्र की ताजपोशी जातिवाद, सम्प्रदायवाद और परिवारवाद के दायरे तक सिमट जाती है. यहाँ आवाम की अपेक्षा पर विराम लगता है और जनमानस की उपेक्षा का बेख़ौफ़ दौड़ चलता है. लफंगों की लफंगई बढ़ जाती है और ज्वलंत मुद्दे पिछड़ जाते हैं. सरकारी पैसों का प्रयोग बपौती पैसों की तरह किया जाता है. बलात्कारियों के पक्ष में पैरवीकारों की भीड़ दिखती है, लेकिन बलात्कारपीड़ितों के पक्ष में मरघट सन्नाटा दिखता है. बेईमानों के पक्ष में जमात दिखती है, लेकिन ईमानदार सडकों पर खाक छानते हैं. राजनैतिक और सार्वजनिक पद पर आसीन संस्कारहीन चरित्र का सीना नाजायज कमाई के संग्रहण से तन जाता है और हम अपनी अविकसित तकदीर को अपनी नियति मान लेते हैं.

हम शिथिल होते गए और वाचाल लोगों के हाथों सत्ता चली गई. राजवल्लभ और सरफराज हमारी चूक के परिणाम हैं. सजायाफ्ता को सत्ता हमारी कुंठित सोच की पहचान है. पालीगंज से हर बार बाहरी प्रत्याशी को थोपने की परंपरा हमारी कमजोरी का प्रमाण है. सत्ता का व्यावसायीकरण कुबेरपतियों के समक्ष हमारे समर्पण का परिणाम है. राजनीति में अपराधियों और धनबलियों की अधिष्ठापना हमारी अदूरदर्शिता के प्रतिफल हैं. दलित दमन और आरक्षण की समीक्षा पर झूठी दलीलों की आड़ में सभी गरीबों का दमन हमारी आपसी सामाजिक फूट के परिणाम हैं. हम सामाजिक न्याय के प्रपंची नेताओं के द्वारा लिखे गए हिन्दू-मुस्लिम दरार की पटकथा के शिकार हैं. धीरे-धीरे सत्ता और पार्टी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई. व्यक्ति दल से ऊपर हो गया. दलीय लोकतंत्र का अंत हुआ और आलाकमान तानाशाह बन गया, मुखिया राजा बन बैठा और कार्यकर्ता सेवक या अनुचर बन गए. चार दिन का छोकड़ा मंत्रीपुत्र होने के कारण सत्ता का संचालक बन जाता है, लेकिन सर्वस्व न्योछावर कर देनेवाला जनसेवक चार दानों के लिए गलियों का ख़ाक छानता है. चार शाम की कचौड़ी पर बिकनेवाले लोकतंत्र का हाल देख लो. 

हम इन विषम परिस्थितियों के जन्मदाता हैं. व्यवस्था-परिवर्तन के लिए कोई आसमानी फ़रिश्ता नहीं आनेवाला. हम लोकतंत्र के मालिक हैं. हमारे नियत में बदलाव से ऐसी नियति का निदान संभव है. कब तक रहेगी ये रफ़्तार………. .

क्या दीपावली और छठ के अवसर पर जागरूक, सजग और निष्पक्ष पहल की संभावना बनेगी? यदि हाँ, तो इस निर्णायक पहल के लिए आपको हमारी शुभकामनाये! यदि नहीं, तो अपनी तकदीर संभालने में असफल जिन्दा लाशों को कैसी शुभकामना?

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