राजनीतिक घरानों, धनबलियों और बाहरी की ताजपोशी से उपेक्षित पालीगंज को एक मुखर नेतृत्व की तलाश: बी.बी. रंजन.

your Profile Photoडाटा तो ऐसा ही कहता है. जनता के पैसों पर लक्ज़री गाड़ियों की सरपट दौड़ से लोग आक्रांत. पहले कहाँ थी आपकी औकात?

 


पालीगंज को ईमानदार, विवेकशील, विकासवादी परिकल्पना से परिपूर्ण एक सुलझे हुए व्यक्तित्व की जरूरत. वंशवादी परंपरा को धोने के मूड में नहीं दिख रहे पालीगंजवासी. पालीगंज को मौनव्रतधारी नहीं, बल्कि एक मुखर नेतृत्व की तलाश.


शिथिलता और फरारी के आलम में सरकता प्रखंड मुख्यालय, रिश्वतखोरी के आगे बेवश जनसमुदाय, दलालों के सामने नतमस्तक प्रशासन और प्रतिनिधियों की मिलीभगत से पालीगंज को निजात की जरूरत: बी.बी. रंजन. 


बिहार में लगातार कई वर्षों से जीत धनबलियों और बाहुबलियों को मिल रहे है. प्रत्याशी का चल, चरित्र और चेहरा हासिये पर चला गया है. सन 2015 के विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमानेवाले कुल 1038 अर्थात् तीस प्रतिशत प्रत्याशियों पर आपराधिक मामले दर्ज थे, जबकि इनमें से 142 अर्थात् 58 प्रतिशत प्रतिनिधि बनने में कामयाब हो गए. कुल 796 प्रत्याशी गंभीर मामलों में आरोपी थे जो कुल भागीदारी का 23 प्रतिशत है, जबकि गंभीर मामलों के 40 प्रतिशत आरोपी  अर्थात् 98 प्रत्याशी सदन में पहुँचने में कामयाब रहे. सभी दलों ने कुल 25 प्रतिशत करोड़पति प्रत्याशियों को मैदान में उतरा था और विजेताओं में 162 के आंकड़ों के साथ 67 प्रतिशत करोडपति विजेता बन गए.

पालीगंज से 16 करोड़ 91 लाख की घोषित सम्पति के मालिक जयवर्धन यादव विजेता बनाकर उभरे, जबकि 2 करोड़ 25 लाख की सम्पति के मालिक रामंजनम शर्मा भाजपा की दावेदारी पाने में सफल रहे. सन 2010 में राजद प्रत्याशी जयवर्धन यादव की कुल सम्पति 52 लाख 83 हजार रूपये बताई गयी थी जबकि भाजपा की प्रत्याशी और विजेता उषा विद्यार्थी ने 53 लाख 65 रूपये की मालकिन होने का दावा पेश किया था. इन पांच वर्षों में जयवर्धन यादव की सम्पति में 32 गुना इजाफा हुआ. ऐसी चर्चा है कि दैनिक जागरण के कार्यालय के रूप में प्रयोग में आनेवाला भवन और दुल्हिनबाज़ार में भारत संचार निगम का संचालित कार्यालय रामलखन सिंह यादव के मकान में चलता है और जयवर्धन के पिता प्रकाशचन्द्र रामलखन यादव के इकलौते संतान हैं. यदि लोगों की इस दावों में दम है तो हलफनामा की सच्चाई पब्लिक समझ सकती है. सन 2005 में 11 लाख की सम्पति की घोषणा करनेवाले दीनानाथ 2010 में महज 13 लाख के मालिक हो पाए थे. दीनानाथ ने अपनी सम्पति में पांच वर्षों में महज दो लाख का इजाफा किया. भूमि के मूल्यों में आयी वृद्धि का भी संभवतः इस घोषणा से कोई रिश्ता नहीं है. हलफनामा ईमानदारी की पराकाष्ठा दर्शाती है, हकीकत पर मेरी कोई टिप्पणी नहीं है. पब्लिक सब जानती है. सन 2005 में शून्य सम्पति का ब्योरा उपलब्ध करानेवाले बारहवीं पास नन्द कुमार नंदा 2010 में 27 लाख रूपये के मालिक बन गए थे. नंदा भाकपा माले के विधायक थे.

गत विधानसभा चुनाव में बिक्रम विधानसभा से निर्दलीय किस्मत आजमानेवाले रमेश शर्मा ने अपनी 928 करोड़ की सम्पति की घोषणा की थी. कांग्रेस के सिद्धार्थ सिंह ने 2 करोड़ 62 लाख की सम्पति होने की पुष्टि की थी, जबकि हलफनामा के आधार पर भाजपा के अनिल कुमार 3 करोड़ के मालिक हैं. सन 2015 के चुनाव में हलफनामा के आधार पर सिद्धार्थ चार आपराधिक मामलों के आरोपी हैं. सन 2010 के चुनाव में लोजपा के टिकट पर किस्मत आजमाने वाले सिद्धार्थ ने अपनी सम्पति 01 करोड़ 23 लाख 91 हजार बतायी थी. तब भी लम्बी सजा काट चुके सिद्धार्थ पर दो आपराधिक मामले लंबित थे. पांच वर्षों में समाप्ति में दोगुना वृद्धि दर्शायी है. पांच वर्षों में लंबित मामले भी दोगुना हो गए हैं. उन दिनों हलफनामा के आधार पर भाजपा के अनिल कुमार की सम्पति 1 करोड़ 27 लाख थी, जबकि कांग्रेस के संजीव सिंह ने 1 करोड़ 22 लाख रूपये की सम्पति का ब्योरा दिया था. सन 2005 के चुनाव में भाजपा के अनिल की सम्पति 27 लाख बताई गयी थी, जबकि राजद के तत्कालीन प्रत्याशी स्व. श्यामदेव सिंह ने लगभग 23 लाख रूपये की सम्पति घोषित की थी. उन दिनों श्यामदेव सिंह पर दो आपराधिक मामले दर्ज थे.

परिस्थितियों के अध्ययन से एक बात सामने आती है. सामाजिक न्याय का दावा पेश करनेवाली पार्टियों और भाजपा ने प्रायः धनबलियो को टिकट देनें में रुचि दिखायी है. पालीगंज की उपेक्षा कुछ ज्यादा हुई है, क्योंकि हर बार भाजपा ने इस क्षेत्र से बाहरी प्रत्याशी को उतारा है. पैतीस वर्षों से भाजपा या विघटित जनता पार्टी के समर्थकों को स्थानीय प्रत्याशी की तलाश है. कन्हाई बाबू सदृश्य ईमानदार व्यक्तित्व ही पालीगंज के उद्धार के लिए योग्य साबित होगा और पालीगंज के लोग ईमानदार और संघर्षशील लेकिन साहसी छवि के नेतृत्व का सम्मान करते रहे हैं.

सामाजिक न्याय का दावा करनेवाली पार्टियों ने गरीबों के मसीहा होने का नाटक खूब किया है, लेकिन टिकट अक्सर धनबलियों को देती रही है. जमीनी और जुझारू ईमानदार छवि को हमेशा दरकिनार किया गया है. स्व. कन्हाई सिंह भी टिकट वितरण के दौरान उपेक्षित होते रहे हैं और उन्हें निर्दलीय भी मैदान में उतरना पड़ता था.

आज की दौर और कन्हाई बाबू के दौर में एक फर्क है. उन दिनों कन्हाई बाबू की ईमानदारी एक उदहारण था, लेकिन क्षेत्र में विकास के बहुमूल्य कार्य नहीं हो पाते थे. आज की तिथि में एक ईमानदार, विवेकशील, विकासवादी परिकल्पना से परिपूर्ण एक सुलझे हुए व्यक्तित्व की जरूरत है, जो सभी स्तर पर और हर जगह दो टूक जबाब दे सके, अव्यवस्था के पोषकों को निरूतर कर सके, उन्हें मजबूर कर सके. 

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